
सरायकेला-खरसावां : झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले के ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र में जिंदगी की एक ऐसी तस्वीर सामने आती है, जहां सुवर्णरेखा नदी की रेत से सोने के कण तलाशने वाले परिवार खुद गरीबी से जूझ रहे हैं। हाथ में कुदाल, खुरपी और लकड़ी की पारंपरिक थाली लेकर ये आदिवासी मजदूर सुबह नदी किनारे पहुंचते हैं और शाम तक मेहनत करते हैं।
रेत और मिट्टी छानकर तलाशते हैं सोना
बहती सुवर्णरेखा नदी की धार के किनारे से पत्थर, मिट्टी और रेत निकाली जाती है। इसे लकड़ी की थाली में रखकर पानी से बार-बार धोया जाता है। मिट्टी और रेत अलग होने के बाद बचे कणों में सोने की चमक दिखाई देती है। यही कच्चा सोना इन परिवारों की दिनभर की मेहनत की कमाई बनता है।
कभी ₹200, कभी ₹300 तो अच्छे दिन में ₹500
स्थानीय मजदूरों के मुताबिक इस काम से होने वाली आमदनी तय नहीं है। किसी दिन ₹200 मिलते हैं, तो किसी दिन ₹300-350। मेहनत और किस्मत साथ दे तो करीब ₹500 तक की कमाई हो जाती है। इसी पैसे से परिवार के खाने-पीने और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी होती हैं।
60 साल से नदी किनारे चल रहा संघर्ष
स्थानीय लोगों की जुबानी यह परंपरा करीब छह दशक से चली आ रही है। सुवर्णरेखा के अलावा बामनी नदी सहित आसपास के इलाकों में भी कुछ परिवार सोने के कण तलाशकर अपनी रोजी-रोटी चलाते हैं। पीढ़ियां बदलीं, लेकिन नदी किनारे संघर्ष नहीं बदला।
हर मौसम में जारी रहती है सोने की तलाश
गर्मी की तपती धूप हो, बरसात का मौसम या कड़ाके की ठंड—रोजगार का दूसरा भरोसेमंद साधन नहीं होने के कारण इन परिवारों के लिए नदी ही सहारा बनी हुई है। कई लोग सुबह घर से खाना लेकर निकलते हैं और दिनभर नदी की रेत छानने के बाद शाम को वापस लौटते हैं।
सोना निकालने वाले हाथों को रोजगार का इंतजार
इन परिवारों की कहानी सिर्फ सोना मिलने की कहानी नहीं है। इसके पीछे रोजगार की कमी, कम आमदनी और सरकारी योजनाओं से अपेक्षित लाभ नहीं मिलने का संघर्ष भी छिपा है।
नदी की रेत से निकला सोना बाजार में बिक जाता है, लेकिन उसे निकालने वाले परिवारों की आर्थिक स्थिति अब भी नहीं बदल पाई है।
अब सरकार से उम्मीद
सबसे बड़ा सवाल यही है कि वर्षों से इस पारंपरिक काम के सहारे जीवन चला रहे इन गरीब आदिवासी परिवारों को क्या सरकार स्वरोजगार और स्थायी आय के साधनों से जोड़ पाएगी?
अगर इन परिवारों को प्रशिक्षण, रोजगार और स्वरोजगार से जोड़ा जाए, तो शायद आने वाले समय में उन्हें सोने की तलाश में दिनभर नदी की रेत छानने की मजबूरी से मुक्ति मिल सके।