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पार्टी बदली तो 10 साल का बैन! कपिल सिब्बल के प्रस्ताव से गरमाई सियासत, CJP ने किया समर्थन - aksharsamvad.com
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नई दिल्ली : वरिष्ठ वकील और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने राजनीतिक दल बदलने वाले सांसदों और विधायकों पर कड़ा प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव रखा है। उनके प्रस्ताव में पैसे या दबाव के चलते पार्टी बदलने वाले जनप्रतिनिधियों पर 10 साल तक रोक लगाने की बात कही गई है। इस प्रस्ताव को ‘कांकरोच जनता पार्टी’ (CJP) ने भी समर्थन दिया है।

दल-बदल पर 10 साल के बैन की मांग

कपिल सिब्बल ने दल-बदल की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव की जरूरत जताई है। उनका कहना है कि राजनीतिक दलों को तोड़ने या जनप्रतिनिधियों को एक पार्टी से दूसरी पार्टी में ले जाने की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है।

सिब्बल ने संविधान की दसवीं अनुसूची में संशोधन की मांग की है, ताकि राजनीतिक दलों के विलय और जनप्रतिनिधियों के दल-बदल के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सके।

दो-तिहाई विधायकों के जाने पर उठे सवाल

मौजूदा दल-बदल कानून के तहत किसी विधायक दल के दो-तिहाई सदस्य किसी दूसरे दल में चले जाते हैं तो कुछ परिस्थितियों में इसे विलय माना जा सकता है। ऐसे मामलों में दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता से छूट का प्रावधान लागू हो सकता है।

सिब्बल का प्रस्ताव इसी व्यवस्था को लेकर सवाल खड़ा करता है। उनका जोर इस बात पर है कि ‘विलय’ राजनीतिक दल का होना चाहिए, केवल बड़ी संख्या में सांसदों या विधायकों का पार्टी छोड़ना नहीं।

CJP ने किया कपिल सिब्बल के प्रस्ताव का समर्थन

‘कांकरोच जनता पार्टी’ ने सिब्बल के प्रस्ताव का समर्थन करते हुए इसे समय की जरूरत बताया है। संगठन के राष्ट्रीय संयोजक अभिजीत दिपके ने भी दल-बदल के खिलाफ सख्त प्रावधानों की वकालत की है।

CJP के सह-संयोजक सौरव दास ने कहा कि ऐसे जनप्रतिनिधियों पर कार्रवाई होनी चाहिए जो किसी पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुनाव जीतने के बाद कथित तौर पर पैसे या दबाव के चलते दूसरी पार्टी में शामिल हो जाते हैं।

20 साल तक चुनाव लड़ने पर रोक की मांग

CJP की ओर से इससे भी कड़े प्रावधान की मांग की गई है। संगठन के अनुसार, उसके पहले के मांग-पत्र में ऐसे लोगों को 20 साल तक किसी सार्वजनिक पद पर रहने या चुनाव लड़ने से रोकने का प्रस्ताव भी रखा गया था।

संगठन ने राजनीतिक दलों को तोड़ने, सांसदों को बड़ी रकम देकर प्रभावित करने और सरकार गिराने जैसी गतिविधियों को लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा बताया है।

दल-बदल कानून पर फिर शुरू होगी बहस?

कपिल सिब्बल के प्रस्ताव ने एक बार फिर देश में दल-बदल कानून और राजनीतिक नैतिकता को लेकर बहस छेड़ दी है। सवाल यह है कि क्या चुनाव जीतने के बाद पार्टी बदलने वाले जनप्रतिनिधियों के लिए मौजूदा कानून पर्याप्त है या इसमें और कठोर प्रावधान जोड़े जाने चाहिए।

अगर दसवीं अनुसूची में बदलाव की मांग आगे बढ़ती है, तो यह मुद्दा आने वाले समय में संसद और राजनीतिक गलियारों में बड़ी बहस का विषय बन सकता है।

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