
नई दिल्ली : 15 सितंबर 2026। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में स्थायी सदस्यता की भारत की मांग फिर चर्चा में है। हालिया BRICS शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परिषद में सुधार के लिए स्पष्ट समयसीमा और ठोस नतीजों पर जोर दिया। सवाल यह है कि भारत की दावेदारी मजबूत होने के बावजूद स्थायी सीट मिलने में देर क्यों हो रही है?
आबादी और अर्थव्यवस्था की दलील
भारत अपनी विशाल आबादी और बढ़ते आर्थिक प्रभाव को दावेदारी का अहम आधार मानता है। उसका तर्क है कि दुनिया के बड़े हिस्से को प्रभावित करने वाले फैसलों में आज के वैश्विक हालात की झलक होनी चाहिए। 1945 में बनी सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का ढाँचा अब तक वही है, जबकि दुनिया की आबादी, अर्थव्यवस्था और चुनौतियाँ काफी बदल चुकी हैं। BRICS के नई दिल्ली घोषणापत्र ने भी सुधार के जरिए विकासशील देशों की आवाज बढ़ाने की बात कही है।
शांति अभियानों में भारत की भूमिका
भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में योगदान देता आया है। समर्थकों के मुताबिक, यह भूमिका दिखाती है कि देश अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की जिम्मेदारियों में सक्रिय भागीदार है। भारत पहले आठ बार सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य भी रह चुका है। मगर अस्थायी सदस्य के तौर पर अनुभव और स्थायी सदस्यता का अधिकार दो अलग बातें हैं; पहले से स्थायी सदस्यों के पास वीटो शक्ति भी है।
परिषद में अभी किसके पास स्थायी सीट है?
सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य हैं। अमेरिका, चीन, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन इसके पाँच स्थायी सदस्य हैं। बाकी दस सीटों के लिए देशों को सीमित अवधि के लिए चुना जाता है। भारत की मांग सिर्फ अपनी सीट तक सीमित नहीं है। सुधार पर चल रही चर्चा में अफ्रीका और अन्य क्षेत्रों के बेहतर प्रतिनिधित्व का मुद्दा भी शामिल है।
फिर अड़चन कहाँ है?
नई स्थायी सीटें जोड़ने के लिए परिषद की संरचना बदलनी होगी। किन क्षेत्रों को कितनी सीटें मिलें और नए सदस्यों को वीटो अधिकार मिले या नहीं—इन सवालों पर देशों के बीच सहमति बनना बाकी है। इसलिए कुछ देशों का भारत का समर्थन करना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे अपने आप स्थायी सदस्यता नहीं मिल जाती। BRICS घोषणापत्र में चीन और रूस ने भारत तथा ब्राजील की संयुक्त राष्ट्र में बड़ी भूमिका की आकांक्षा का समर्थन किया है। भारत की स्थायी सीट की मांग बनी हुई है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि सुधार की बातचीत कब किसी साझा फैसले तक पहुँचेगी।