
जमशेदपुर : डिमना चौक स्थित महात्मा गांधी मेमोरियल (एमजीएम) मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 12 करोड़ रुपये की लागत से तैयार कैथ लैब अब गंभीर सवालों के घेरे में है। जिस भवन का निर्माण कैथ लैब के लिए किया गया और जिस पर बाकायदा ‘कैथ लैब’ लिखा है, अब उसी भवन में कैथ लैब शुरू करने को लेकर तकनीकी अड़चन सामने आ गई है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब भवन कैथ लैब के लिए बनाया जा रहा था तो इसकी तकनीकी उपयुक्तता की जांच किस स्तर पर हुई थी? नक्शा किसने तैयार किया? डिजाइन किसने बनाया? मंजूरी किसने दी? निर्माण की निगरानी किसने की? और अगर ऑक्सीजन सप्लाई जैसी समस्या थी तो उसे निर्माण के दौरान ही क्यों नहीं पकड़ा गया?
ऑक्सीजन बनी सबसे बड़ी अड़चन
एमजीएम की नवनिर्मित कैथ लैब को शुरू करने की कवायद के बीच ऑक्सीजन की निर्बाध आपूर्ति को लेकर तकनीकी समस्या सामने आई है। बताया जा रहा है कि अस्पताल का मुख्य ऑक्सीजन प्लांट मेडिकल कॉलेज परिसर के पीछे की ओर है, जबकि नया कैथ लैब भवन उससे काफी दूरी पर स्थित है। कैथ लैब जैसी संवेदनशील चिकित्सा यूनिट में सुरक्षित और निर्बाध ऑक्सीजन आपूर्ति बेहद महत्वपूर्ण होती है।
इसी समस्या को लेकर रांची में स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त सचिव के साथ एमजीएम प्रबंधन की उच्चस्तरीय बैठक हुई। बैठक में एमजीएम मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. संजय कुमार, अस्पताल अधीक्षक डॉ. बलराम झा समेत वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए। तकनीकी अड़चनों पर चर्चा के बाद विशेषज्ञ टीम से पूरे मामले की जांच कराने और जल्द व्यावहारिक समाधान निकालने का निर्देश दिया गया है।
मुख्य अस्पताल में नई जगह
तकनीकी समस्या के बीच मुख्य अस्पताल के मौजूदा छह मंजिला भवन में कैथ लैब स्थापित करने का विकल्प भी सामने आया है। बताया गया कि इस भवन में कैथ लैब और किडनी रोग विभाग के लिए पर्याप्त जगह उपलब्ध हो सकती है।
वर्तमान में यहां ईएनटी, नेत्र और चर्म रोग विभाग संचालित हो रहे हैं। जरूरत पड़ने पर इन विभागों को नवनिर्मित कैथ लैब भवन में शिफ्ट करने का प्रस्ताव है। अगर ऐसा होता है तो सवाल और बड़ा हो जाएगा। जिस भवन को कैथ लैब के लिए बनाया गया, उसमें दूसरे विभाग क्यों जाएंगे और कैथ लैब को मुख्य अस्पताल में क्यों लाना पड़ेगा?
नक्शे से निर्माण तक सवाल
किसी बड़े चिकित्सा भवन का निर्माण केवल चारदीवारी और कमरों तक सीमित नहीं होता। लोकेशन, ऑक्सीजन और मेडिकल गैस पाइपलाइन, बिजली व्यवस्था, आपातकालीन सुविधाएं और मरीजों की आवाजाही जैसे पहलुओं का तकनीकी अध्ययन जरूरी होता है।
ऐसे में यह जानना जरूरी है कि कैथ लैब भवन की योजना बनाते समय इन सभी बिंदुओं का आकलन किया गया था या नहीं। अगर तकनीकी जांच हुई थी तो ऑक्सीजन सप्लाई की समस्या अब क्यों सामने आई? अगर समस्या पहले से मौजूद थी तो निर्माण के दौरान उसका समाधान क्यों नहीं हुआ? और अगर समस्या बाद में सामने आई तो संबंधित अधिकारियों और तकनीकी एजेंसियों की भूमिका की समीक्षा क्यों नहीं होनी चाहिए?
इन सवालों का अंतिम जवाब विशेषज्ञों की रिपोर्ट और परियोजना से जुड़े दस्तावेजों की जांच के बाद ही सामने आएगा।
भवन का बदलेगा इस्तेमाल?
चर्चा है कि नवनिर्मित कैथ लैब भवन में दंत रोग, नेत्र रोग, चर्म रोग और ईएनटी विभागों को शिफ्ट किया जा सकता है। यदि ऐसा होता है तो कैथ लैब के लिए बनाए गए भवन का मूल उद्देश्य बदल जाएगा।
ऐसे में यह सवाल भी उठेगा कि परियोजना की योजना और लोकेशन तय करने में क्या कोई चूक हुई थी। साथ ही यह भी स्पष्ट करना होगा कि भवन को दूसरे विभागों के लिए तैयार करने में अतिरिक्त खर्च होगा या नहीं और मुख्य अस्पताल में कैथ लैब स्थापित करने के लिए कितनी राशि खर्च होगी।
स्वास्थ्य विभाग की ओर से करीब 10 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत किए जाने की बात भी सामने आई है। इसलिए जनता यह जानना चाहती है कि पहले की परियोजना और नई व्यवस्था पर कुल कितना सरकारी धन खर्च होगा।
क्या भ्रष्टाचार हुआ? जांच जरूरी
12 करोड़ रुपये की परियोजना को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है, लेकिन केवल तकनीकी समस्या के आधार पर भ्रष्टाचार का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। यदि अनियमितता की आशंका है तो स्वीकृत नक्शा, तकनीकी रिपोर्ट, टेंडर प्रक्रिया, निर्माण गुणवत्ता, निरीक्षण रिपोर्ट और भुगतान से जुड़े दस्तावेजों की जांच जरूरी होगी।
जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि मामला तकनीकी चूक, गलत प्लानिंग या किसी अन्य प्रशासनिक कमी का है।
हर साल 200 से ज्यादा मरीज रेफर
एमजीएम में कैथ लैब की जरूरत इसलिए भी अहम है क्योंकि गंभीर हृदय रोगियों को एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी के लिए दूसरे अस्पतालों में रेफर करना पड़ता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार हर साल 200 से अधिक गंभीर कार्डियक मरीजों को बाहर भेजे जाने की बात सामने आती है।
एंजियोग्राफी में हजारों रुपये खर्च हो सकते हैं, जबकि एंजियोप्लास्टी या बैलूनिंग में खर्च डेढ़ से दो लाख रुपये तक पहुंच सकता है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह बड़ी चुनौती है।
हार्ट मरीजों को कब राहत?
कैथेटराइजेशन लैब में हृदय की धमनियों की जांच और जरूरत पड़ने पर तत्काल उपचार किया जाता है। एंजियोग्राफी से ब्लॉकेज का पता चलता है, जबकि एंजियोप्लास्टी में अवरुद्ध धमनी को खोलकर जरूरत पड़ने पर स्टेंट लगाया जाता है।
हार्ट अटैक के मामलों में समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में एमजीएम में कैथ लैब शुरू होने से जमशेदपुर और आसपास के मरीजों को बड़ी राहत मिल सकती है।
12 करोड़ का लाभ कब?
कैथ लैब के लिए सिर्फ भवन पर्याप्त नहीं है। मशीनों की स्थापना, सुरक्षित ऑक्सीजन और मेडिकल गैस व्यवस्था, प्रशिक्षित स्टाफ और कार्डियोलॉजी विशेषज्ञों की उपलब्धता भी जरूरी है।
अब जनता का सवाल सीधा है, नक्शा किसने बनाया? मंजूरी किसने दी? तकनीकी जांच कब हुई? ऑक्सीजन की समस्या पहले क्यों नहीं पकड़ी गई? और सबसे अहम 12 करोड़ रुपये खर्च होने के बाद एमजीएम के मरीजों को कैथ लैब की सुविधा आखिर कब मिलेगी?
अब विशेषज्ञ टीम की रिपोर्ट और स्वास्थ्य विभाग के अगले फैसले पर सबकी नजर है। यही रिपोर्ट तय करेगी कि करोड़ों रुपये की इस परियोजना का मूल उद्देश्य पूरा होगा या कैथ लैब के लिए एक बार फिर नई व्यवस्था करनी पड़ेगी।