
लाल बहादुर शास्त्री की जयंती पर विशेष
नई दिल्ली : 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री थे। यह युद्ध अगस्त से सितंबर 1965 तक चला था। शास्त्री ने इसी युद्ध के दौरान “जय जवान, जय किसान” का प्रसिद्ध नारा दिया था।
युद्ध के दौरान पाकिस्तान के आक्रमण का सामना करते हुए जब भारतीय सेना ने लाहौर पर धावा बोला तो इस अप्रत्याशित आक्रमण की भयावहता को देखकर अमेरिका भी कांपने लगा। उसने तुरंत लाहौर में रह रहे अपने नागरिकों को निकालने के लिए कुछ समय के लिए युद्धविराम की मांग की। तत्पश्चात रूस और अमेरिका की चहलकदमी के बाद भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को रूस के ताशकंद समझौते में बुलाया गया।
ताशकंद पहुंचकर शास्त्री ने समझौते को मंजूर तो कर लिया, लेकिन पाकिस्तान के जीते हुए इलाकों को लौटाना उन्हें हरगिज मंजूर नहीं था। अंतरराष्ट्रीय दबाव में शास्त्री ने ताशकंद समझौते पर हस्ताक्षर तो किए, लेकिन अपने कार्यकाल में इस जमीन को वापस करने से इनकार कर दिया।
हर पल परिस्थितियां बदलती रहीं और फिर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री अयूब खान के साथ युद्धविराम पर हस्ताक्षर करने के कुछ घंटे बाद ही प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का संदिग्ध निधन हो गया। 11 जनवरी 1966 की रात देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री की मृत्यु हो गई। मृत्यु का कारण हार्ट अटैक बताया गया।
शास्त्री की मृत्यु के बाद गुलजारीलाल नंदा को देश का कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाया गया और वह तब तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहे, जब तक इंदिरा गांधी को कांग्रेस संसदीय दल ने विधिवत शास्त्री का उत्तराधिकारी नहीं चुन लिया।
क्या शास्त्री की मृत्यु जहर देने से हुई?
आज भी लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु को लेकर जनमानस में तरह-तरह के कयास लगाए जाते हैं। बहुतेरे लोगों का, जिनमें उनके परिवार के लोग भी शामिल हैं, मानना है कि शास्त्री की मृत्यु हार्ट अटैक से नहीं, बल्कि जहर देने से हुई।
शास्त्री की मृत्यु को लेकर पहली जांच राज नारायण ने करवाई थी, जो बेनतीजा रही। मजे की बात यह है कि इंडियन पार्लियामेंट्री लाइब्रेरी में आज उसका कोई रिकॉर्ड ही मौजूद नहीं है।
यह भी आरोप लगाया गया कि शास्त्री का पोस्टमार्टम भी नहीं हुआ। वर्ष 2009 में जब यह सवाल उठाया गया तो भारत सरकार की ओर से यह जवाब दिया गया कि शास्त्री के प्राइवेट डॉक्टर आर.एन. चुघ और कुछ रूसी डॉक्टरों ने मिलकर उनकी मौत की जांच तो की थी, लेकिन सरकार के पास उसका कोई रिकॉर्ड नहीं है। बाद में प्रधानमंत्री कार्यालय से जब इसकी जानकारी मांगी गई तो उसने भी अपनी मजबूरी जताई।
सबसे पहले वर्ष 1978 में प्रकाशित एक हिंदी पुस्तक ‘ललिता के आंसू’ में शास्त्री की मृत्यु की करुण कथा को स्वाभाविक ढंग से उनकी धर्मपत्नी ललिता शास्त्री के माध्यम से कहलवाया गया था। उस समय यानी वर्ष 1978 में ललिताजी जीवित थीं।
एक अन्य अंग्रेजी पुस्तक में लेखक-पत्रकार कुलदीप नैयर ने भी, जो उस समय ताशकंद में शास्त्री के साथ गए थे, इस घटनाक्रम पर विस्तार से प्रकाश डाला है।
वर्ष 2012 में शास्त्री के तीसरे पुत्र सुनील शास्त्री ने भी भारत सरकार से इस रहस्य से पर्दा हटाने की मांग की थी, लेकिन आज तक शास्त्री की मृत्यु के रहस्य से पर्दा नहीं उठ पाया।
बहरहाल, आज देश ने काफी तरक्की कर ली है और हम सामरिक दृष्टिकोण से भी काफी मजबूत स्थिति में पहुंच चुके हैं। बावजूद इसके, आज भी शास्त्री की मृत्यु के सवाल पर मजबूरी और टालमटोल का कोहरा छाया हुआ है।
(यह लेख विभिन्न पुस्तकों से जुटाई गई जानकारी पर आधारित है। अक्षर संवाद इसकी सत्यता की पुष्टि नहीं करता।)