
- ट्रेन से चांडिल पहुंचे थे 20-25 बाराती, धादकीडीह में आदिवासी रीति-रिवाज से हुआ था विवाह; महज तीन रुपये और तीन कपड़े थे ‘पोन’
चांडिल : दिशोम गुरु शिबू सोरेन और रूपी सोरेन की शादी की करीब छह दशक पुरानी कहानी आज भी चांडिल के धादकीडीह गांव के बुजुर्गों की यादों में ताजा है। वर्ष 1962 में हुआ यह विवाह आज के भव्य और खर्चीले शादी समारोहों से बिल्कुल अलग था। बारात ट्रेन से चांडिल पहुंची थी और स्टेशन से दूल्हे शिबू सोरेन को बैलगाड़ी से धादकीडीह गांव ले जाया गया था।
ट्रेन से चांडिल पहुंची थी बारात
बताया जाता है कि शिबू सोरेन करीब 20 से 25 बारातियों के साथ बरकाकाना की ट्रेन से चांडिल स्टेशन पहुंचे थे। स्टेशन पर पहुंचने के बाद उन्हें बैलगाड़ी में बैठाकर धादकीडीह गांव ले जाया गया। बारात में शामिल कई अन्य लोग स्टेशन से गांव तक पैदल भी पहुंचे थे।
उस दौर में गांवों तक पहुंचने के साधन सीमित थे। इसलिए ट्रेन और बैलगाड़ी से पहुंची यह बारात आज के समय में अपने आप में एक अनूठी याद बन गई है।
नदी किनारे ठहरे थे बाराती
बारातियों के ठहरने की व्यवस्था गांव के पास नदी किनारे की गई थी। वधू पक्ष की ओर से चावल, दाल, खस्सी, लकड़ी, चूल्हा और पानी की व्यवस्था की गई थी। बारातियों ने वहीं अपना खाना तैयार किया। परंपरा के अनुसार उन्हें हंडिया भी परोसी गई थी।
महज तीन रुपये और तीन कपड़े था ‘पोन’
आदिवासी समाज की पारंपरिक विवाह व्यवस्था में दहेज के बजाय ‘पोन’ देने की परंपरा थी। शिबू सोरेन के परिवार की ओर से रूपी सोरेन के परिवार को विवाह के दौरान तीन रुपये और तीन कपड़े पोन के रूप में दिए गए थे।
इसके अलावा वर पक्ष की ओर से एक काली बकरी और हंडिया भी साथ लाई गई थी। उस समय विवाह में आर्थिक दिखावे के बजाय सामाजिक रिश्ते और परंपराओं को महत्व दिया जाता था।
सादगी और परंपरा से हुआ था विवाह
रूपी सोरेन के रिश्ते में भाई बताए जाने वाले महाराज माझी के मुताबिक, शिबू सोरेन और रूपी सोरेन का विवाह पूरी तरह आदिवासी रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। उस दौर की शादी में आज की तरह बड़े पंडाल, महंगे वाहन और भव्य आयोजन नहीं होते थे।
बारातियों के भोजन से लेकर उनके ठहरने तक की व्यवस्था भी गांव के लोग और वधू पक्ष मिलकर करते थे। यही सादगी इस विवाह को आज भी यादगार बनाती है।
धादकीडीह से जुड़ा है सोरेन परिवार का गहरा रिश्ता
चांडिल का धादकीडीह गांव सोरेन परिवार के लिए सिर्फ विवाह की यादों वाला गांव नहीं है। दिवंगत रूपी सोरेन के बड़े बेटे दुर्गा सोरेन और छोटे बेटे तथा विधायक बसंत सोरेन का जन्म भी इसी ऐतिहासिक गांव में हुआ था।
इस तरह धादकीडीह का रिश्ता सोरेन परिवार की कई पीढ़ियों से जुड़ा रहा है। गांव के बुजुर्ग आज भी शिबू सोरेन और रूपी सोरेन की शादी से जुड़े प्रसंगों को याद करते हैं।
‘पोन’ का मकसद आर्थिक लेन-देन नहीं
माझी परगाना महाल के जिला सचिव श्यामल माझी के अनुसार, आदिवासी परंपरा में ‘पोन’ को दहेज के रूप में नहीं देखा जाता। इसका उद्देश्य दो परिवारों के बीच संबंध को सामाजिक सम्मान और स्वीकृति देना रहा है।
शिबू सोरेन और रूपी सोरेन की वर्ष 1962 की शादी इसी परंपरा की एक मिसाल के तौर पर आज भी याद की जाती है। ट्रेन से आई बारात, बैलगाड़ी से गांव पहुंचे दूल्हे और महज तीन रुपये के ‘पोन’ की यह कहानी उस दौर की सादगी और आदिवासी सामाजिक परंपराओं की झलक दिखाती है।