
रांची : झारखंड की भर्ती परीक्षाओं से जुड़े विवाद में अब अदालत के अगले कदम पर अभ्यर्थियों की नजरें टिकी हैं। झारखंड कर्मचारी चयन आयोग की संयुक्त स्नातक स्तरीय परीक्षा यानी जेएसएससी-सीजीएल को रद्द करने के राज्य सरकार के आदेश के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर हाई कोर्ट में बहस पूरी हो गई है। गुरुवार, 8 अक्टूबर को दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया। वहीं, जेपीएससी से संबंधित मामलों में सुनवाई शुक्रवार, 9 अक्टूबर को आगे बढ़नी है।
सरकार ने पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर उठाए सवाल
जस्टिस दीपक रोशन की अदालत में राज्य सरकार ने परीक्षा रद्द करने के निर्णय का बचाव किया। सरकार की ओर से वरीय अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने दलील दी कि मामला कुछ अभ्यर्थियों तक सीमित गड़बड़ी का नहीं है। जांच में सामने आई परिस्थितियां परीक्षा संचालन की पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। सरकारी पक्ष के अनुसार, प्रश्नपत्र की गोपनीयता भंग होने और प्रश्नों के उत्तर अभ्यर्थियों तक पहुंचने के आरोपों ने प्रतियोगिता की निष्पक्षता प्रभावित की। ऐसे में केवल कुछ परिणामों को निरस्त करने से पूरी प्रक्रिया पर भरोसा बहाल करना संभव नहीं था।
नेपाल तक उत्तर पहुंचाने का आरोप
अदालत में सरकार ने कहा कि जांच के दौरान मिले दस्तावेजों और अन्य तथ्यों से प्रश्नपत्र तथा उत्तरों के अनुचित प्रसार के आरोपों को आधार मिलता है। कुछ अभ्यर्थियों को नेपाल सहित अन्य स्थानों पर उत्तर याद कराए जाने की बात भी सरकारी पक्ष ने रखी। सरकार का तर्क था कि प्रतियोगी परीक्षा में सभी उम्मीदवारों को समान अवसर मिलना आवश्यक है। यदि कुछ लोगों को पहले से प्रश्नों या उत्तरों की जानकारी मिल जाए, तो मेहनत और योग्यता के आधार पर चयन की व्यवस्था प्रभावित होती है।
पूरी परीक्षा रद्द करने के औचित्य पर बहस
सुनवाई में महत्वपूर्ण मुद्दा यह भी रहा कि कथित गड़बड़ी से लाभ लेने वाले और निष्पक्ष तरीके से परीक्षा देने वाले अभ्यर्थियों को अलग किया जा सकता है या नहीं। सरकारी पक्ष ने कहा कि उपलब्ध परिस्थितियों में यह अंतर तय करना कठिन है। इसी आधार पर सरकार ने पूरी परीक्षा रद्द करने को उचित बताया। समर्थन में पश्चिम बंगाल की भर्ती से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का भी उल्लेख किया गया।
एजेंसी की भूमिका पर भी सवाल
हस्तक्षेपकर्ता की ओर से अधिवक्ता कुमार हर्ष ने परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसी की भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने अदालत में दावा किया कि पहले ब्लैकलिस्ट की गई एजेंसी को परीक्षा संचालन की जिम्मेदारी दी गई थी। उनके अनुसार, प्रश्नपत्र के कथित व्यापक प्रसार ने व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर किया। उन्होंने यह भी कहा कि कथित किंगपिन अभय तिवारी की गिरफ्तारी के बाद जांच में नए तथ्य मिले हैं। ये बातें सुनवाई में रखे गए दावे हैं, जिन पर अदालत का अंतिम निष्कर्ष अभी आना बाकी है।
अन्य भर्ती मामलों पर भी नजर
11वीं से 13वीं झारखंड सिविल सेवा परीक्षा, सीडीपीओ और फूड सेफ्टी ऑफिसर सहित अन्य भर्ती मामलों से संबंधित याचिकाएं भी न्यायिक विचाराधीन हैं। सीजीएल पर फैसला सुरक्षित होने के बाद अभ्यर्थियों को अब निर्णय का इंतजार है।