
चांडिल : नदी किनारे बारात का ठहराव, खुद भोजन बनाते बाराती और बैलगाड़ी से गांव पहुंचता दूल्हा—शिबू सोरेन और रूपी सोरेन के विवाह की कहानी आज भी धादकीडीह के बुजुर्गों की यादों में जीवित है। वर्ष 1962 में हुई इस शादी में आदिवासी परंपराओं और ग्रामीण जीवन की सादगी की झलक मिलती है। रूपी सोरेन के निधन के बाद उनसे जुड़े पुराने प्रसंगों के साथ इस विवाह की यादें भी फिर सामने आई हैं।
धादकीडीह से जुड़ा दशकों पुराना रिश्ता
चांडिल प्रखंड के धादकीडीह गांव निवासी सुदू किस्कू और चैती किस्कू की बेटी रूपी किस्कू का विवाह शिबू सोरेन से हुआ था। झारखंड आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले दिशोम गुरु का इस गांव से पारिवारिक संबंध तभी से जुड़ गया। रूपी सोरेन के रिश्ते के भाई महाराज मांझी इस विवाह के प्रत्यक्षदर्शी रहे हैं। उनके अनुसार, शादी स्थानीय आदिवासी रीति-रिवाजों के अनुरूप संपन्न हुई थी। आयोजन में दिखावे से अधिक परंपराओं और आपसी संबंधों को महत्व दिया गया।
स्टेशन से बैलगाड़ी में पहुंचे शिबू सोरेन
महाराज मांझी बताते हैं कि शिबू सोरेन लगभग 20 से 25 बारातियों के साथ बरकाकाना से ट्रेन द्वारा चांडिल स्टेशन पहुंचे थे। वहां से दूल्हे को बैलगाड़ी पर बैठाकर धादकीडीह ले जाया गया। साथ आए दूसरे बाराती स्टेशन से गांव तक पैदल पहुंचे। आज विवाह समारोहों में वाहनों के लंबे काफिले आम दिखाई देते हैं, लेकिन उस समय की यह यात्रा अलग तस्वीर पेश करती है। ट्रेन, बैलगाड़ी और पैदल सफर के जरिए बारात गांव पहुंची थी। यही प्रसंग बुजुर्गों की स्मृतियों में आज भी खास जगह रखता है।
नदी किनारे ठहरे, खुद बनाया खाना
बारातियों के ठहरने की व्यवस्था गांव के पास नदी किनारे की गई थी। वधू पक्ष ने भोजन तैयार करने के लिए चावल, दाल, खस्सी, लकड़ी, चूल्हा और पानी उपलब्ध कराया था। इन सामग्रियों से बारातियों ने स्वयं खाना पकाया। महाराज मांझी के अनुसार, परंपरा के तहत बारातियों को हंडिया भी परोसी गई थी। भोजन से लेकर ठहरने तक की व्यवस्था ग्रामीण परिवेश के अनुरूप थी। इस आयोजन की यादों में सामूहिक भागीदारी और सरल जीवन की झलक साफ दिखाई देती है।
तीन रुपये और तीन कपड़ों से निभाई ‘पोन’ की रस्म
विवाह में ‘पोन’ देने की पारंपरिक रस्म भी निभाई गई थी। इस प्रथा के अनुसार वर पक्ष की ओर से वधू पक्ष को राशि दी जाती है। महाराज मांझी बताते हैं कि शिबू सोरेन के परिवार ने तीन रुपये और तीन कपड़े पोन के रूप में दिए थे। वर पक्ष अपने साथ एक काली बकरी और हंडिया भी लेकर आया था।
परिवार की यादों का हिस्सा बना गांव
धादकीडीह का सोरेन परिवार से संबंध विवाह तक सीमित नहीं रहा। रूपी सोरेन के बड़े बेटे दुर्गा सोरेन और छोटे बेटे बसंत सोरेन का जन्म भी इसी गांव में हुआ था। बुजुर्गों की स्मृतियों में सुरक्षित ये प्रसंग धादकीडीह और सोरेन परिवार के पुराने रिश्ते की कहानी कहते हैं।