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सख्ती का ढोंग,वैन का किराया बढ़ा दिया गया-बच्चों की जान से खिलवाड़ — स्कूल वैन बना चलती हुई “भेड़-बकरी गाड़ी” - aksharsamvad.com
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जमशेदपुर में प्रशासन द्वारा स्कूल वैन पर सख्ती के नाम पर जो अभियान चलाया गया, उसका परिणाम न तो बच्चों की सुरक्षा में दिख रहा है और न ही व्यवस्था में सुधार के रूप में। उल्टा, इसका सीधा असर अभिभावकों की जेब और बच्चों की जिंदगी—दोनों पर पड़ रहा है।

प्रशासन ने नियमों का हवाला देकर वैन चालकों पर दबाव बनाया, फिटनेस, परमिट और सीटिंग कैपेसिटी की जांच की बात कही। लेकिन इसका नतीजा क्या निकला? वैन का किराया बढ़ा दिया गया, और दूसरी तरफ बच्चों को पहले से भी ज्यादा ठूंस-ठूंस कर भरा जा रहा है।

 

🚸 सुरक्षा नहीं, सिर्फ दिखावा

जिन नियमों को लागू करने की बात की गई थी—जैसे एक सीट पर एक बच्चा, पर्याप्त जगह, वेंटिलेशन—उनका पालन जमीनी स्तर पर कहीं नहीं दिखता।

आज भी छोटे-छोटे बच्चों को एक-दूसरे के ऊपर बैठाकर, दरवाजे तक लटकाकर स्कूल पहुंचाया जा रहा है।

🌡️ भीषण गर्मी में खतरे का सफर

इस समय तापमान 41 डिग्री के पार जा रहा है। ऐसे में बंद वैन के अंदर दर्जनों बच्चों को ठूस देना सीधे तौर पर उनकी सेहत और जान से खिलवाड़ है।

घुटन, डिहाइड्रेशन और बेहोशी जैसी घटनाएं कभी भी हो सकती हैं।

💰 अभिभावकों पर दोहरी मार

एक तरफ सुरक्षा के नाम पर किराया बढ़ा दिया गया, दूसरी तरफ सुरक्षा शून्य।

अभिभावक मजबूर हैं—या तो महंगा किराया दें या फिर बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ने दें।

⚠️ जिम्मेदार कौन?

क्या प्रशासन सिर्फ चालान काटकर अपनी जिम्मेदारी पूरी समझ रहा है?

क्या स्कूल प्रबंधन की कोई जवाबदेही नहीं बनती?

क्या वैन ऑपरेटरों को सिर्फ कमाई की चिंता है?

🛑 समाधान क्या है?

सख्ती दिखावे की नहीं, जमीनी होनी चाहिए

हर वैन की नियमित जांच और ओवरलोडिंग पर तत्काल कार्रवाई

स्कूलों को परिवहन व्यवस्था करनी होगी

अभिभावकों की शिकायतों के लिए हेल्पलाइन और त्वरित कार्रवाई जरूरी

किसी बड़ी घटना कि प्रतिक्ष। ?

📢 निष्कर्ष

आज हालात यह हैं कि “सुरक्षा” के नाम पर सिर्फ कागजों में सुधार हो रहा है, जबकि हकीकत में बच्चे रोज जोखिम भरा सफर तय कर रहे हैं।

अगर समय रहते प्रशासन ने सच्ची और सख्त कार्रवाई नहीं की, तो कोई बड़ी घटना होने पर जिम्मेदारी तय करना मुश्किल नहीं होगा—लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।

यह सख्ती नहीं, लापरवाही का संगठित रूप है।

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