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नई दिल्ली : नेपाल-तिब्बत सीमा के पास भूस्खलन के बाद बनी एक विशाल बैरियर झील ने नेपाल के साथ-साथ भारत के मैदानी इलाकों को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्टों के मुताबिक, नदी का रास्ता मलबे और चट्टानों से रुकने के बाद पानी जमा होकर यह झील बनी है। अब बढ़ते जलस्तर और प्राकृतिक बांध पर दबाव के कारण इसके टूटने का खतरा बताया जा रहा है।

30 लाख क्यूबिक मीटर अतिरिक्त पानी का अनुमान

रिपोर्ट के अनुसार, झील में पहले ही करीब 20 लाख क्यूबिक मीटर पानी जमा हो चुका है। मौसम पूर्वानुमान के आधार पर अगले कुछ दिनों में करीब 30 लाख क्यूबिक मीटर अतिरिक्त पानी आने की आशंका जताई गई है। ऐसे में झील का जलस्तर बढ़ने के साथ प्राकृतिक बांध पर दबाव बढ़ सकता है। बैरियर लेक का सबसे बड़ा खतरा यही होता है कि इसका बांध किसी मजबूत कंक्रीट संरचना की तरह नहीं होता। यह अक्सर मलबे, मिट्टी और चट्टानों से बना होता है। पानी का दबाव अचानक बढ़ने पर इसके टूटने की आशंका रहती है।

झील टूटी तो नेपाल में आएगी बाढ़ की तेज लहर

बताया जा रहा है कि यह झील नेपाल के रुस्तवा जिले के ऊपरी हिस्से में छोचेन खोला और पुरेयु त्सांगपो नदियों के संगम क्षेत्र के पास बनी है। इन जलधाराओं का संबंध आगे भोटेकोशी और फिर त्रिशूली नदी तंत्र से जुड़ता है। अगर प्राकृतिक बांध अचानक टूटता है तो भारी मात्रा में पानी और मलबा बेहद तेज रफ्तार से नीचे की ओर जा सकता है। इससे नदी किनारे बसे इलाकों में अचानक बाढ़ जैसी स्थिति पैदा होने का खतरा बढ़ सकता है।

बिहार-UP को लेकर क्यों बढ़ी चिंता?

नेपाल की कई प्रमुख नदियां भारत में प्रवेश करती हैं और बिहार तथा उत्तर प्रदेश के नदी तंत्र से जुड़ती हैं। इसलिए नेपाल में किसी बड़े जलप्रलय की स्थिति पैदा होने पर सीमावर्ती भारतीय इलाकों में भी असर की आशंका रहती है। हालांकि, इस समय यह कहना जल्दबाजी होगी कि झील टूटने पर बिहार या उत्तर प्रदेश में निश्चित रूप से तबाही आएगी। इसका वास्तविक असर झील के टूटने की मात्रा, पानी की रफ्तार, नदी के प्रवाह और रास्ते में मौजूद भौगोलिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

चीन ने बढ़ाई निगरानी, नेपाल में अलर्ट

रिपोर्ट के मुताबिक, चीनी अधिकारी ड्रोन के जरिए इलाके की निगरानी कर रहे हैं और संभावित आपदा से निपटने की तैयारी की जा रही है। नेपाल में भी भोटेकोशी और त्रिशूली नदी के निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को सतर्क रहने और नदी किनारे से दूर रहने की सलाह दी गई है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है-क्या पहाड़ों के बीच बनी यह ‘मौत की झील’ अपना प्राकृतिक बांध संभाल पाएगी, या इसके टूटने से नेपाल में बाढ़ की नई लहर उठेगी और उसका असर भारत के मैदानी इलाकों तक महसूस होगा?

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