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जमशेदपुर के जिला परिवहन कार्यालय (DTO) का दृश्य।

जमशेदपुर : ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने की प्रक्रिया को सरकार ने काफी हद तक ऑनलाइन कर दिया है। आवेदन से लेकर स्लॉट बुकिंग और टेस्ट तक कई चरण डिजिटल माध्यम से पूरे किए जाते हैं। इसके बावजूद जमशेदपुर जिला परिवहन कार्यालय (DTO) के आसपास कथित बिचौलियों की सक्रियता और लाइसेंस बनवाने के नाम पर अतिरिक्त रकम लिए जाने की शिकायतें सामने आई हैं। आवेदकों का दावा है कि निर्धारित सरकारी शुल्क करीब ₹1700 होने के बावजूद दलालों अथवा बिचौलियों के माध्यम से पूरी प्रक्रिया कराने में ₹5 हजार से ₹6 हजार तक खर्च हो रहा है। यदि यह दावा सही है तो सरकारी शुल्क और आवेदकों से लिए जा रहे कुल पैसे के बीच बड़ा अंतर सामने आता है।

₹1700 से ₹6000 तक कैसे पहुंच रहा खर्च?

शिकायतों के अनुसार लाइसेंस की प्रक्रिया के अलग-अलग चरणों के नाम पर रकम मांगी जाती है। आवेदकों ने आवेदन के लिए करीब ₹400, स्क्रूटनी के नाम पर करीब ₹250 और ऑनलाइन टेस्ट के लिए ₹100 से ₹200 तक की राशि बताए जाने की बात कही है। हालांकि, इन रकमों में से कौन-सी राशि वास्तव में सरकारी शुल्क है और कौन-सी कथित सेवा या बिचौलिये के माध्यम से लिए जाने वाले पैसे हैं, यह स्पष्ट नहीं है। इसलिए पूरे मामले में परिवहन विभाग का आधिकारिक स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण हो जाता है।

सरकारी फीस और अतिरिक्त रकम का हिसाब सार्वजनिक हो

आम आवेदक के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि लाइसेंस बनवाने में उसे वास्तव में कितनी सरकारी फीस देनी है। यदि किसी चरण पर अलग से शुल्क निर्धारित है तो उसकी जानकारी विभाग की वेबसाइट, कार्यालय और ऑनलाइन पोर्टल पर स्पष्ट रूप से उपलब्ध होनी चाहिए। हर भुगतान की रसीद और ऑनलाइन ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड उपलब्ध होने से आवेदकों को यह समझने में आसानी होगी कि उन्होंने किस मद में कितनी राशि जमा की है।

ऑनलाइन व्यवस्था के बावजूद दलालों की जरूरत क्यों?

लाइसेंस की प्रक्रिया ऑनलाइन होने के बावजूद कई आवेदक फॉर्म भरने, दस्तावेज अपलोड करने, स्लॉट बुक करने और टेस्ट से जुड़ी प्रक्रिया के लिए दूसरों की मदद लेते हैं। खासकर पहली बार लाइसेंस बनवाने वाले लोगों को तकनीकी प्रक्रिया की जानकारी नहीं होने के कारण बिचौलियों पर निर्भर होना पड़ता है। यही स्थिति कथित दलालों के लिए जगह बनाने का कारण बनती है। सवाल यह है कि यदि पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन और निर्धारित शुल्क के तहत है, तो आम नागरिक को काम कराने के लिए कार्यालय के आसपास मौजूद कथित बिचौलियों की मदद क्यों लेनी पड़ रही है?

DTO के आसपास निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल

परिवहन कार्यालय के आसपास प्रशासनिक और पुलिस व्यवस्था मौजूद रहती है। ऐसे में कथित बिचौलियों की सक्रियता की शिकायतें सामने आने के बाद निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या कार्यालय परिसर और आसपास के क्षेत्रों में नियमित निगरानी होती है? क्या सीसीटीवी फुटेज की जांच की जाती है? क्या शिकायत मिलने पर बिचौलियों की पहचान कर कार्रवाई की जाती है? इन सवालों का जवाब प्रशासन और परिवहन विभाग से अपेक्षित है।

आम आदमी पर हजारों रुपये का अतिरिक्त बोझ

शिकायत में बताए गए आंकड़ों के अनुसार ₹1700 और ₹6000 के बीच करीब ₹4300 का अंतर है। एक सामान्य परिवार के लिए यह रकम महत्वपूर्ण है। ड्राइविंग लाइसेंस आज रोजगार, व्यवसाय और रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ा जरूरी दस्तावेज है। इसलिए यदि निर्धारित सरकारी शुल्क से कई गुना अधिक रकम खर्च होने की शिकायत सामने आ रही है, तो इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।

निष्पक्ष जांच से साफ होगी तस्वीर

इन आरोपों को सही मानने से पहले पूरे मामले की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। आवेदकों की रसीद, ऑनलाइन भुगतान, आवेदन संबंधी दस्तावेज और अन्य भुगतान रिकॉर्ड की जांच की जा सकती है। साथ ही कार्यालय के आसपास कथित बिचौलियों की गतिविधियों की भी पड़ताल जरूरी है। यदि अतिरिक्त रकम की वसूली की शिकायत सही पाई जाती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं यदि अतिरिक्त भुगतान किसी वैध सरकारी प्रक्रिया या सेवा शुल्क के तहत हुआ है तो परिवहन विभाग को उसका पूरा विवरण सार्वजनिक करना चाहिए।

सबसे बड़ा सवाल: ₹1700 से ₹6000 क्यों?

मामला सिर्फ एक आवेदक की परेशानी तक सीमित नहीं है। असली सवाल व्यवस्था की पारदर्शिता का है। अगर लाइसेंस की सरकारी फीस करीब ₹1700 है और आवेदक से ₹5 से ₹6 हजार तक खर्च होने की शिकायत सामने आ रही है, तो बाकी रकम आखिर किस मद में जा रही है? परिवहन विभाग की ओर से शुल्क संरचना और कथित अतिरिक्त वसूली को लेकर स्पष्ट स्थिति सामने आने के बाद ही तस्वीर पूरी तरह साफ हो सकेगी।

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