
नई दिल्ली : ग्लोबल वार्मिंग का असर अब हिमालय के ग्लेशियरों पर साफ दिखाई दे रहा है। बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं और उनके पीछे हटने से कई नई झीलें बन रही हैं। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर कार्बन उत्सर्जन की मौजूदा स्थिति जारी रही तो वर्ष 2100 तक हिमालय, काराकोरम, पामीर, हिंदू कुश और तियान शान जैसे ऊंचे एशियाई पर्वतीय क्षेत्रों में मौजूद बचे हुए ग्लेशियरों का करीब तीन-चौथाई हिस्सा खत्म हो सकता है।
ग्लेशियरों के पिघलने से बन रही हैं खतरनाक झीलें
ग्लेशियर जब पीछे हटते हैं तो उनके साथ आया चट्टानी मलबा और मिट्टी जमा होकर मोरेन बनाता है। यही मोरेन पिघले हुए पानी को रोक लेते हैं और धीरे-धीरे झील का आकार बढ़ने लगता है। समस्या तब गंभीर हो जाती है जब इन झीलों को रोकने वाला प्राकृतिक बांध कमजोर पड़ता है। उसके टूटने पर लाखों-करोड़ों गैलन पानी अचानक नीचे की ओर बह सकता है और रास्ते में आने वाले गांवों, सड़कों, पुलों और दूसरी संरचनाओं को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।
गर्म पानी ग्लेशियर को अंदर से कर रहा कमजोर
वैज्ञानिकों के मुताबिक खतरा सिर्फ ऊपर से दिखाई देने वाली बर्फ के पिघलने तक सीमित नहीं है। झीलों का गहरा और गादयुक्त पानी सूर्य की गर्मी को ज्यादा अवशोषित करता है। यह गर्म पानी ग्लेशियर के किनारों और अंदर मौजूद बर्फ को तेजी से पिघला सकता है। इस प्रक्रिया से ग्लेशियर के भीतर सुरंग और खाली जगह बनने लगती हैं। समय के साथ ये हिस्से कमजोर होकर ढह सकते हैं। वैज्ञानिकों ने इसकी तुलना ग्लेशियर के अंदर से खोखला होने की प्रक्रिया से की है।
हिमालय में बढ़ती झीलों ने बढ़ाई चिंता
नेपाल के हिमालयी क्षेत्र में कई ग्लेशियरों के पीछे हटने के साथ झीलों का आकार लगातार बढ़ा है। उदाहरण के तौर पर न्गोजुम्पा ग्लेशियर के पास मौजूद एक छोटा जलाशय पिछले कुछ दशकों में काफी फैल चुका है। इसी तरह इम्जा ग्लेशियर के सामने बनी झील भी पिछले कई दशकों में तेजी से बड़ी हुई है। 2024 में खुंबू क्षेत्र के थामे शेरपा गांव में मोरेन बांध टूटने के बाद भारी मात्रा में पानी नीचे आया था। इस घटना में गांव के स्कूल, अस्पताल और घरों को नुकसान पहुंचा था। यह घटना दिखाती है कि ग्लेशियरों के पीछे बन रही झीलें कितनी गंभीर चुनौती बन सकती हैं।
नेपाल की हालिया त्रासदी ने फिर उठाए सवाल
नेपाल में हाल में हुई विनाशकारी बाढ़ के सटीक कारण को लेकर अभी पूरी तस्वीर सामने नहीं आई है। उपलब्ध वैज्ञानिक आकलन के अनुसार एक विशाल ग्लेशियर का हिस्सा अलग होकर करीब चार हजार फीट नीचे गिरा और भोटेकोशी नदी की एक सहायक नदी से जा मिला। इसके बाद चट्टानों और पहाड़ी मलबे के खिसकने से अचानक विनाशकारी बाढ़ की स्थिति बनी। खास बात यह है कि इस घटना में किसी सक्रिय ग्लेशियर झील के फटने के स्पष्ट संकेत नहीं मिले। इसी वजह से वैज्ञानिक इस घटना को समझने के लिए अलग-अलग संभावनाओं का अध्ययन कर रहे हैं।
आज बाढ़, कल पानी का संकट?
हिमालयी ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना सिर्फ अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा नहीं है। लंबे समय में ग्लेशियरों के बड़े पैमाने पर खत्म होने से उन नदियों के जल प्रवाह पर भी असर पड़ सकता है जो हिमालयी बर्फ और ग्लेशियरों से पोषित होती हैं। यानी एक तरफ ग्लेशियरों के पिघलने से तत्काल बाढ़ और झीलों का खतरा बढ़ सकता है, वहीं दूसरी तरफ भविष्य में ग्लेशियरों के कम होने से पानी की उपलब्धता भी प्रभावित हो सकती है।
हिमालय के लिए बढ़ती चुनौती
वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ते तापमान के बीच ग्लेशियरों का पीछे हटना और नई झीलों का निर्माण एक-दूसरे से जुड़ी प्रक्रियाएं हैं। अगर तापमान वृद्धि और कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित नहीं किया गया तो आने वाले दशकों में हिमालय का प्राकृतिक स्वरूप तेजी से बदल सकता है। इसलिए हिमालय में बन रही ग्लेशियर झीलों की निगरानी, संभावित जोखिम वाले इलाकों की पहचान और समय रहते चेतावनी की व्यवस्था अब पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गई है।