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कोल्हान विश्वविद्यालय की नई सीनेट में सांसद जोबा माझी समेत 14 विधायकों को मिली जगह।
  • झारखंड राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम 2026 के तहत नई सीनेट का गठन, राज्यपाल होंगे अध्यक्ष और कुलपति उपाध्यक्ष; मनोनीत सदस्यों का कार्यकाल तीन साल

जमशेदपुर : कोल्हान विश्वविद्यालय की नई सीनेट के गठन के साथ ही विश्वविद्यालय की व्यवस्था में बड़ा बदलाव सामने आया है। झारखंड राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम 2026 की धारा 41(5) के तहत गठित नई सीनेट में पहली बार सभी सदस्यों को मनोनीत किया गया है। इसके साथ ही पूर्व में चुनाव के जरिए सीनेट में पहुंचे शिक्षक प्रतिनिधियों को नई व्यवस्था में जगह नहीं मिली है।

नई व्यवस्था में जनप्रतिनिधियों की बढ़ी भूमिका

नई सीनेट में कोल्हान के तीनों जिलों के जनप्रतिनिधियों को प्रतिनिधित्व दिया गया है। सिंहभूम की सांसद जोबा माझी के अलावा 14 विधायकों को सीनेट में शामिल किया गया है। इनमें दीपक बिरुआ, चंपई सोरेन, सरयू राय, पूर्णिमा साहू, मंगल कालिंदी, संजीव सरदार, सोमेश चंद्र सोरेन, समीर कुमार मोहंती, सविता महतो, दशरथ गागराई, निरल पूर्ति, सुखराम उरांव, सोनाराम सिंकू और जगत माझी शामिल हैं।

चुनाव से आए शिक्षकों को झटका

नई सीनेट की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब सदस्य बनने के लिए चुनाव की पुरानी व्यवस्था प्रभावी नहीं रहेगी। समाचार पत्र में प्रकाशित जानकारी के अनुसार, करीब आठ महीने पहले चुनाव जीतकर सीनेट सदस्य बने शिक्षकों को अब नई व्यवस्था के कारण बाहर का रास्ता देखना पड़ा है। इससे विश्वविद्यालय की नई सीनेट संरचना को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं।

राज्यपाल होंगे अध्यक्ष, कुलपति उपाध्यक्ष

नई सीनेट में झारखंड के राज्यपाल सह कुलाधिपति अध्यक्ष और कुलपति उपाध्यक्ष होंगे। कुलसचिव को इस सर्वोच्च नीति-निर्धारक निकाय का सदस्य सचिव बनाया गया है। मनोनीत सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्ष निर्धारित किया गया है।

अकादमिक प्रतिनिधित्व भी शामिल

सीनेट में जनप्रतिनिधियों के अलावा कॉलेज प्राचार्य, वरिष्ठ प्राध्यापक, शिक्षाविद और छात्र प्रतिनिधियों को भी शामिल किया गया है। इस तरह नई संरचना में राजनीतिक, अकादमिक और छात्र प्रतिनिधित्व को एक साथ जगह दी गई है।

अब उठ रहे ये सवाल

नई व्यवस्था सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब चुनाव के जरिए शिक्षक प्रतिनिधि चुने गए थे, तो नई सीनेट में उनका प्रतिनिधित्व क्यों समाप्त किया गया? क्या नई व्यवस्था विश्वविद्यालय की निर्णय प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाएगी या इससे निर्वाचित शिक्षक प्रतिनिधित्व कमजोर होगा? इन सवालों पर अब विश्वविद्यालय के शिक्षकों और संगठनों की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण होगी।

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