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रांची : झारखंड के ग्रामीण इलाकों में पुल-पुलियों की बदहाल स्थिति अब बड़े आवागमन संकट का रूप लेती जा रही है। राज्य के कई जिलों में 20 से ज्यादा पुल-पुलिया पांच से नौ साल से टूटे या क्षतिग्रस्त पड़े हैं। इन पुलों के खराब होने से 300 से अधिक गांवों का मुख्य सड़क से संपर्क प्रभावित हुआ है। बारिश के मौसम में स्थिति और गंभीर हो गई है।

ग्रामीणों को स्कूल, अस्पताल, बाजार और प्रखंड मुख्यालय तक पहुंचने के लिए कई किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ रही है। कई स्थानों पर नदी-नालों को पार करना लोगों की मजबूरी बन गया है।

5 से 9 साल से टूटे हैं कई पुल, अब तक नहीं हुआ स्थायी समाधान

झारखंड के रांची, खूंटी, गुमला, सिमडेगा, लोहरदगा, हजारीबाग, पलामू और जामताड़ा जैसे जिलों के दूरदराज इलाकों में कई पुल-पुलिया लंबे समय से क्षतिग्रस्त हैं। कुछ पुल पांच से नौ साल पहले ही टूट गए थे, लेकिन अभी तक उनका पुनर्निर्माण या जीर्णोद्धार नहीं हो सका है।

पुल टूटने का असर सिर्फ यातायात पर नहीं पड़ रहा, बल्कि ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी भी प्रभावित हो रही है। स्कूली बच्चों को लंबा रास्ता तय करना पड़ रहा है। किसानों को खेत और मंडी के बीच आवागमन में परेशानी हो रही है। छोटे व्यापारियों के लिए गांव से बाजार तक पहुंचना महंगा और मुश्किल हो गया है।

300 गांवों का संपर्क प्रभावित, 10 से 35 किमी तक बढ़ी दूरी

क्षतिग्रस्त पुलों के कारण कई गांवों के लोगों को मुख्य मार्ग तक पहुंचने के लिए 10 से 35 किलोमीटर तक अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ रही है। बारिश में नदी और नालों का जलस्तर बढ़ने से जोखिम और बढ़ जाता है।

सबसे बड़ी परेशानी मरीजों और स्कूली बच्चों को हो रही है। कई जगह बच्चों का स्कूल जाना मुश्किल हो गया है, जबकि गंभीर मरीजों को अस्पताल पहुंचाने में भी अतिरिक्त समय लग रहा है।

कई परिवार बेहतर सुविधा के लिए दूसरे स्थानों पर चले गए हैं। वहीं गांव में रह रहे लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए खराब रास्तों और अस्थायी मार्गों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।

कई पुल 10 से 20 साल पुराने, निर्माण और मरम्मत के प्रस्ताव अटके

प्रमंडलीय इंजीनियरों के मुताबिक क्षतिग्रस्त पुलों में बड़ी संख्या ऐसे पुलों की है, जो 10 से 20 साल पुराने हैं। बजट और प्रशासनिक स्वीकृति के अभाव में कई पुलों के निर्माण और मरम्मत का काम समय पर आगे नहीं बढ़ सका।

विभाग की ओर से प्राथमिकता के आधार पर क्षतिग्रस्त पुलों की सूची तैयार कर नए निर्माण और जीर्णोद्धार के प्रस्ताव भेजे गए हैं। इसके बावजूद कई मामलों में धरातल पर काम शुरू होने का इंतजार है।

मुख्यमंत्री ग्राम सेतु योजना के तहत बने कई पुल

ग्रामीण इलाकों को मुख्य सड़कों, बाजार, स्कूल और अस्पताल से जोड़ने के उद्देश्य से मुख्यमंत्री ग्राम सेतु योजना के तहत बड़ी संख्या में पुल-पुलियों का निर्माण कराया गया था। स्थानीय विधायक अपने विधानसभा क्षेत्र की जरूरत के अनुसार पुल निर्माण की अनुशंसा भी कर सकते हैं।

हालांकि, पुराने पुलों के क्षतिग्रस्त होने के बाद उनके पुनर्निर्माण और मरम्मत की प्रक्रिया कई मामलों में वर्षों तक चलती रही।

सिमडेगा में 3.50 करोड़ का पुल गिरा, सात साल बाद भी इंतजार

सिमडेगा सदर प्रखंड के बीरू-तामड़ा मार्ग पर गिरमा नदी के ऊपर करीब 3.50 करोड़ रुपये की लागत से पुल का निर्माण कराया गया था। भारी बारिश के दौरान 18 अगस्त 2019 को पुल गिर गया।

पुल के टूटने से इलाके के 20 से ज्यादा गांवों का आवागमन प्रभावित हुआ। लेकिन करीब सात साल गुजरने के बाद भी पुल के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकी है।

यह पुल रामरेखा धाम कॉरिडोर को ध्यान में रखते हुए बनाया गया था। इसके टूटने से रामरेखा धाम जाने वाले श्रद्धालुओं को रांची और गुमला की ओर से पहुंचने के लिए करीब 10 किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ रही है।

सोनाहातू में भी जीर्णोद्धार का प्रस्ताव वर्षों से लंबित

रांची के सोनाहातू में बामलाडीह और हराडीह-बूढ़ाडीह पुल के जीर्णोद्धार का प्रस्ताव करीब दो से तीन साल पहले तैयार कर मुख्य अभियंता के पास भेजा गया था। लेकिन अभी तक काम शुरू नहीं हो सका है।

इसी तरह राज्य के अन्य क्षतिग्रस्त पुलों की मरम्मत और पुनर्निर्माण के प्रस्ताव भी विभागीय स्तर पर लंबित बताए जा रहे हैं।

इंजीनियरों के जवाब से उठ रहे सवाल

विशेष प्रमंडल के मुख्य अभियंता अवधेश कुमार का कहना है कि उन्हें क्षतिग्रस्त पुलों के संबंध में जानकारी नहीं है। दूसरी ओर, विभागीय स्तर पर पुलों के जीर्णोद्धार और निर्माण के प्रस्ताव भेजे जाने की बात सामने आ रही है।

ऐसे में सवाल यह है कि जब वर्षों से पुल टूटे पड़े हैं और प्रस्ताव भी तैयार किए जा चुके हैं, तो निर्माण कार्य शुरू होने में इतनी देरी क्यों हो रही है?

अब सवाल-300 गांवों को कब मिलेगी सुरक्षित राह?

झारखंड के ग्रामीण इलाकों में पुल सिर्फ कंक्रीट का ढांचा नहीं, बल्कि स्कूल, अस्पताल, बाजार और रोजगार तक पहुंचने की जीवनरेखा हैं। वर्षों से टूटे पुलों के कारण सैकड़ों गांवों की कनेक्टिविटी प्रभावित है।

अब ग्रामीणों की नजर सरकार और संबंधित विभाग पर है कि जर्जर पुलों की मरम्मत और नए पुलों का निर्माण कब तेज होगा और 300 से ज्यादा गांवों को सुरक्षित सड़क संपर्क कब मिलेगा।

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