
पटना: बिहार राज्य उपभोक्ता आयोग ने गर्भवती महिला की मौत के मामले में चिकित्सकीय लापरवाही को गंभीरता से लेते हुए डॉक्टर पर 20 लाख रुपये का मुआवजा लगाया है। आयोग ने डॉक्टर को मृतका के पति को यह राशि 60 दिनों के भीतर देने का निर्देश दिया है। इसके अलावा मुकदमा खर्च के रूप में 20 हजार रुपये भी देने होंगे। तय अवधि में भुगतान नहीं करने पर 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा।
पुरानी अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट के आधार पर इलाज का आरोप
मामला छपरा के भगवान बाजार स्थित भूमिजा चिकित्सा केंद्र से जुड़ा है। शिकायत के अनुसार, गर्भवती शालू जैन पेट में तेज दर्द और गर्भस्थ शिशु की हलचल बंद होने की शिकायत लेकर डॉक्टर विमला शाही के पास पहुंची थीं।
आरोप था कि डॉक्टर ने शारीरिक जांच किए बिना पुरानी अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट के आधार पर उनकी स्थिति को सामान्य बताया और दवा लेने की सलाह देकर वापस भेज दिया।
इसके बाद जब शालू की हालत बिगड़ी तो उन्हें पटना के फोर्ड अस्पताल ले जाया गया। वहां जांच के दौरान पता चला कि गर्भस्थ शिशु की पहले ही मौत हो चुकी थी और संक्रमण फैलने के कारण महिला की स्थिति गंभीर हो गई थी।
गंभीर शिकायत को नजरअंदाज करना पड़ा भारी
मामले में आयोग के समक्ष यह सवाल प्रमुखता से उठा कि जब महिला ने गर्भावस्था के दौरान तेज दर्द और बच्चे की हलचल बंद होने जैसी गंभीर शिकायत की थी, तो तत्काल आवश्यक जांच क्यों नहीं कराई गई।
आयोग ने माना कि ऐसी स्थिति में डॉक्टर को नए अल्ट्रासाउंड अथवा विशेषज्ञ की राय लेनी चाहिए थी। आयोग के अनुसार, उपलब्ध परिस्थितियों में आवश्यक चिकित्सकीय सावधानी नहीं बरती गई।
11 अक्टूबर को हुई थी शालू की मौत
इलाज के दौरान 11 अक्टूबर 2013 को शालू जैन की मौत हो गई थी। आयोग ने मामले की परिस्थितियों और उपलब्ध रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद चिकित्सकीय लापरवाही के लिए डॉक्टर को जिम्मेदार माना।
आयोग ने ‘रेस इप्सा लोक्विटर’ के सिद्धांत को लागू करते हुए डॉक्टर पर मुआवजे की जिम्मेदारी तय की।
60 दिन में भुगतान का आदेश
आयोग के अध्यक्ष जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने डॉक्टर को मृतका के पति को 20 लाख रुपये मुआवजा 60 दिनों के भीतर देने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही 20 हजार रुपये मुकदमा खर्च के रूप में भी देने होंगे।
निर्धारित समय में राशि का भुगतान नहीं करने पर 8 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देना होगा। फैसले ने यह संदेश दिया है कि मरीज की गंभीर शिकायतों को नजरअंदाज करना चिकित्सकीय जिम्मेदारी के लिहाज से भारी पड़ सकता है।