
मुंबई : करीब दो करोड़ रुपये के सीमित बजट में तैयार हुई फिल्म ‘हनुमान अंश’ की अप्रत्याशित सफलता ने हिंदी फिल्म उद्योग का ध्यान एक बार फिर पौराणिक और सांस्कृतिक कहानियों की ओर खींचा है। नीब करौरी बाबा के जीवन-सफर से प्रेरित बताई जा रही यह फिल्म 7 अगस्त को रिलीज हुई थी। निर्माताओं के अनुसार, इसे अलग-अलग धर्मों और आयु वर्ग के दर्शकों से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली। फिल्म की चर्चा के बीच अब करण जौहर समेत कई बड़े निर्माता भी भारतीय पौराणिक कथाओं पर आधारित परियोजनाओं की तैयारी करते दिखाई दे रहे हैं।
छोटे बजट की फिल्म ने खींचा ध्यान
‘हनुमान अंश’ ने यह संकेत दिया है कि आकर्षक कहानी, भावनात्मक जुड़ाव और मजबूत प्रस्तुति के सहारे छोटे बजट की फिल्म भी दर्शकों तक पहुंच सकती है। इससे पहले ‘कृष्णावतारम: पार्ट 1’, ‘लालो–कृष्ण सदा सहायते’ और ‘हनु मैन’ जैसी फिल्मों की सफलता ने भी इस विषय में दर्शकों की बढ़ती रुचि को रेखांकित किया था। फिल्म कारोबार पर नजर रखने वालों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में धार्मिक स्थलों के विकास और सांस्कृतिक विषयों पर बढ़ी सार्वजनिक चर्चा ने लोगों को अपनी परंपराओं से दोबारा जोड़ने में भूमिका निभाई है। यही बदलाव अब दर्शकों की सिनेमाई पसंद में भी नजर आ रहा है।
कृष्ण की शिक्षाओं पर केंद्रित होगी कहानी
‘कृष्णावतारम: पार्ट 1’ के निर्देशक हार्दिक गज्जर के अनुसार, उनकी फिल्म भगवान कृष्ण के जीवन-दर्शन और जीवन जीने की सीख पर आधारित है। उनका कहना है कि कृष्ण के संपूर्ण व्यक्तित्व को एक ही फिल्म में समेटना कठिन है, इसलिए कहानी को प्रेम और कर्म जैसे प्रमुख विषयों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। इसके दूसरे भाग पर भी काम किए जाने की बात कही गई है। निर्माताओं का उद्देश्य पौराणिक कथाओं को आधुनिक प्रस्तुति के साथ युवा दर्शकों तक पहुंचाना है, ताकि नई पीढ़ी संस्कृति और परंपराओं को मनोरंजन के माध्यम से समझ सके।
करण जौहर भी लाएंगे राधा-कृष्ण की कथा
रिपोर्ट के मुताबिक करण जौहर भी राधा और कृष्ण की कहानी पर आधारित फिल्म बनाने की तैयारी में हैं। इसके अलावा संजय मिश्रा की ‘तेरा साईं’, खाटू श्याम पर प्रस्तावित फिल्म और ‘महाकाव्य श्री रामायण कथा’ जैसी कई परियोजनाएं निर्माण के अलग-अलग चरणों में बताई जा रही हैं। रणबीर कपूर की बहुप्रतीक्षित ‘रामायण’ को भी इसी बढ़ते रुझान का हिस्सा माना जा रहा है।
नई पीढ़ी को जड़ों से जोड़ने की कोशिश
फिल्मकारों का कहना है कि भारत में पौराणिक कथाओं की कोई कमी नहीं है। इन कहानियों में आस्था के साथ प्रेम, कर्म, समानता, साहस और मानवीय मूल्यों के संदेश भी मौजूद हैं। यदि इन्हें संवेदनशीलता, प्रमाणिकता और प्रभावशाली तकनीक के साथ पेश किया जाए, तो ये फिल्में युवा दर्शकों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ सकती हैं। आने वाले समय में बॉक्स ऑफिस पर पौराणिक सिनेमा का यह रुझान और मजबूत होता दिखाई दे सकता है।