
सरायकेला : सरायकेला-खरसावां जिले के नीमडीह प्रखंड अंतर्गत लाकड़ी गांव का लेवाटांड टोला आज भी पक्की सड़क जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित है। ग्रामीणों के अनुसार, लेवाटांड से बांदू मुख्य सड़क तक करीब डेढ़ किलोमीटर लंबा रास्ता कच्चा है। बरसात होते ही यह रास्ता कीचड़ और गहरे गड्ढों में तब्दील हो जाता है। स्थिति इतनी खराब हो जाती है कि इस पर पैदल चलना भी चुनौती बन जाता है।
मरीजों के लिए खटिया ही बनी एंबुलेंस
सड़क की बदहाली का सबसे गंभीर असर मरीजों, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों पर पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि आपात स्थिति में एंबुलेंस टोले तक नहीं पहुंच पाती। ऐसे में परिवार और गांव के लोग मरीज को खटिया पर बैठाकर या लिटाकर करीब डेढ़ किलोमीटर दूर मुख्य सड़क तक ले जाने को मजबूर होते हैं। मुख्य मार्ग पर पहुंचने के बाद ही मरीज को वाहन से नीमडीह अथवा जमशेदपुर के अस्पताल भेजा जा सकता है। ग्रामीणों के मुताबिक, स्वास्थ्य संबंधी आपात स्थिति में रास्ते की यह परेशानी प्रत्येक मिनट को महत्वपूर्ण बना देती है।
कीचड़ से गुजरकर स्कूल पहुंचते हैं बच्चे
लेवाटांड के विद्यार्थियों की परेशानी भी कम नहीं है। बच्चों को रोज स्कूल और कॉलेज जाने के लिए इसी कीचड़ भरे रास्ते से गुजरना पड़ता है। बरसात में रास्ता फिसलन भरा हो जाता है, जिससे गिरने और चोट लगने का डर बना रहता है। कई स्थानों पर पानी और कीचड़ जमा होने से बच्चों के कपड़े तथा किताबें भी खराब हो जाती हैं। ग्रामीणों का कहना है कि खराब रास्ते का असर बच्चों की नियमित पढ़ाई पर पड़ रहा है।
शांखा नदी पर पुल नहीं, जोखिम भरा सफर
लेवाटांड से झिमरी जाने वाले करीब दो किलोमीटर लंबे मार्ग में शांखा नदी पड़ती है। नदी पर पुल नहीं होने के कारण लोगों को सुरक्षित आवागमन का रास्ता उपलब्ध नहीं है। ग्रामीणों का आरोप है कि मजबूरी में कई लोग रेलवे ब्रिज अथवा रेलवे ट्रैक की ओर जाते हैं, जो बेहद जोखिमपूर्ण है। उन्होंने प्रशासन से नदी पर जल्द पुल बनवाने की मांग की है।
जनप्रतिनिधियों के खिलाफ बढ़ा आक्रोश
लंबे समय से समस्या का समाधान नहीं होने के कारण ग्रामीणों में जनप्रतिनिधियों के प्रति नाराजगी बढ़ रही है। उनका आरोप है कि चुनाव के समय विकास के वादे किए जाते हैं, लेकिन बाद में गांव की स्थिति को भुला दिया जाता है। इसी नाराजगी के बीच ग्रामीणों ने “सड़क नहीं तो वोट नहीं” का नारा दिया है। हालांकि मतदान को लेकर अंतिम निर्णय सामूहिक बैठक के बाद लेने की बात कही गई है। ग्रामीणों की प्रमुख मांग है कि लेवाटांड को बांदू मुख्य सड़क से जोड़ने वाली पक्की सड़क बनाई जाए और शांखा नदी पर पुल का निर्माण कराया जाए। अब लोगों की निगाह प्रशासन की पहल पर टिकी है।