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80 साल पुराने पानी विवाद पर बड़ा समझौता, किशाऊ बांध से हरियाणा को मिलेगा यमुना जल; हिमाचल को करीब ₹2,000 करोड़ का बिजली लाभ - aksharsamvad.com
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नई दिल्ली : 80 साल से अधिक समय से चर्चा में रही किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर छह राज्यों के बीच अब औपचारिक समझौता हो गया है। 15 सितंबर 2026 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की मौजूदगी में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों ने किशाऊ परियोजना समझौते पर हस्ताक्षर किए।

टोंस नदी पर बनेगा 232.6 मीटर ऊंचा बांध

किशाऊ परियोजना के तहत हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा के पास टोंस नदी पर 232.6 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी डैम बनाया जाएगा। इसमें करीब 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी का भंडारण होगा। परियोजना से लगभग 97 हजार हेक्टेयर जमीन की सिंचाई और 1,476 मिलियन यूनिट जलविद्युत उत्पादन का लक्ष्य है।

हरियाणा को यमुना में बढ़ेगी पानी की उपलब्धता

किशाऊ परियोजना को ऊपरी यमुना बेसिन में जल उपलब्धता बढ़ाने वाली महत्वपूर्ण परियोजना के रूप में देखा जा रहा है। केंद्र के अनुसार परियोजना से यमुना में अतिरिक्त जल उपलब्ध होगा और इससे दिल्ली समेत संबंधित राज्यों को पेयजल, सिंचाई और अन्य उपयोगों के लिए पानी मिलेगा।

हरियाणा के लिए इसका महत्व इसलिए भी है क्योंकि राज्य यमुना बेसिन में अपने हिस्से के पानी की उपलब्धता और भंडारण बढ़ाने की मांग करता रहा है। परियोजना से जुड़े जल बंटवारे की व्यवस्था छह राज्यों के बीच हुए समझौते के अनुसार लागू होगी।

हिमाचल को बिजली के बदले मिलेगा बड़ा आर्थिक लाभ

परियोजना में हिमाचल प्रदेश के सामने बिजली घटक की लागत का हिस्सा भी था। जून 2026 में बनी सहमति के अनुसार हिमाचल के बिजली घटक की लागत साझा करने के बदले उसके हिस्से के पानी को दिल्ली और राजस्थान को देने पर सहमति बनी थी।

परियोजना पूरी होने के बाद हिमाचल को बिजली घटक से मिलने वाला लाभ महत्वपूर्ण होगा। हालांकि करीब ₹2,000 करोड़ के लाभ का दावा परियोजना से जुड़े अनुमान के रूप में किया गया है, इसे सीधे नकद भुगतान के रूप में नहीं समझना चाहिए।

केंद्र उठाएगा करीब 90 प्रतिशत वित्तीय भार

किशाऊ परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना घोषित किया गया है। इसके जल घटक की लागत का करीब 90 प्रतिशत वित्तीय भार केंद्र सरकार उठाएगी, जबकि शेष 10 प्रतिशत भागीदार राज्यों के हिस्से आएगा।

यह व्यवस्था राज्यों पर पड़ने वाले वित्तीय दबाव को कम करने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।

1940 में पहली बार बनी थी परियोजना की कल्पना

किशाऊ परियोजना की अवधारणा आजादी से पहले 1940 में सामने आई थी। 1945 में तत्कालीन पंजाब सरकार ने इसका सर्वे भी कराया था। इसके बाद परियोजना लंबे समय तक अलग-अलग राज्यों के बीच सहमति और जल बंटवारे के विवादों में अटकी रही।

12 मई 1994 को ऊपरी यमुना बेसिन में जल बंटवारे से जुड़े समझौते के तहत अलग-अलग भंडारण परियोजनाओं के लिए अलग समझौतों का प्रावधान किया गया था। बाद में रेणुकाजी और लखवार परियोजनाओं से जुड़े मुद्दों पर सहमति बनने के बाद किशाऊ परियोजना को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हुआ।

अब परियोजना के आगे बढ़ने का रास्ता साफ

16 जून 2026 को छह राज्यों के बीच किशाऊ परियोजना के क्रियान्वयन के लिए समझौता ज्ञापन पर सहमति बनी थी। इसके बाद 15 सितंबर को औपचारिक समझौते पर हस्ताक्षर हो गए।

इस समझौते के साथ करीब आठ दशक से लंबित परियोजना को लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम पूरा हो गया है। अब आगे परियोजना के निर्माण, वित्तीय व्यवस्था और अन्य स्वीकृतियों से जुड़े चरण पूरे किए जाने हैं।

दिल्ली को भी मिलेगा फायदा

केंद्र सरकार के अनुसार किशाऊ परियोजना का सबसे बड़ा लाभ दिल्ली को मिलेगा। परियोजना से यमुना में उपलब्ध पानी बढ़ाने और पर्यावरणीय प्रवाह को बेहतर करने में मदद मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा दिल्ली को पेयजल उपलब्धता में भी लाभ मिलने का दावा किया गया है।

कुल मिलाकर, किशाऊ समझौता सिर्फ बांध निर्माण तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में यमुना का पानी, छह राज्यों के बीच जल बंटवारा, हिमाचल का बिजली लाभ, हरियाणा की जल जरूरत और दिल्ली की पेयजल एवं यमुना पुनर्जीवन की जरूरत सभी जुड़े हुए हैं।

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