
मेरठ : पश्चिमी उत्तर प्रदेश के वकीलों की हाईकोर्ट बेंच की पुरानी मांग एक बार फिर चर्चा में है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात के लिए जा रहे अधिवक्ताओं को पुलिस ने रास्ते में रोका, जिसके बाद कुछ देर तीखी नोकझोंक हुई। वकील अपनी मांग सीधे मुख्यमंत्री के सामने रखना चाहते थे। बाद में प्रतिनिधिमंडल की उनसे बातचीत हुई, लेकिन बेंच के गठन पर कोई घोषणा नहीं हुई।
लद्दाख का उदाहरण क्यों दिया?
अधिवक्ताओं ने मुख्यमंत्री के सामने लद्दाख से जुड़ी न्यायिक व्यवस्था का उदाहरण रखा। उनका सुझाव था कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए भी अलग बेंच का प्रस्ताव तैयार कर केंद्र सरकार के पास भेजा जाए। तस्वीरों में दी गई खबर के अनुसार, वकीलों ने मुख्यमंत्री से इस संबंध में नियम और प्रक्रिया स्पष्ट करने का भी आग्रह किया। मुख्यमंत्री ने प्रतिनिधिमंडल से कहा कि हाईकोर्ट बेंच देना अकेले उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है। ऐसे में वकीलों की मांग और मुख्यमंत्री के जवाब के बाद अब चर्चा इस बात पर केंद्रित है कि प्रस्ताव को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया क्या होगी।
वकीलों का तर्क: न्याय के लिए लंबा सफर
अधिवक्ताओं का कहना है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों को हाईकोर्ट से जुड़े मामलों के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। उनके मुताबिक, इससे समय और खर्च दोनों बढ़ते हैं। वे लंबित मुकदमों और क्षेत्र के बड़े दायरे का हवाला देकर स्थानीय बेंच की जरूरत बता रहे हैं। यह मांग कई दशकों से उठाई जा रही है। वकील चाहते हैं कि सरकार उनकी मांग को औपचारिक रूप से आगे बढ़ाए। उनका कहना है कि पश्चिमी जिलों में न्यायिक सुविधा बढ़ने से पक्षकारों और अधिवक्ताओं, दोनों को राहत मिल सकती है। हालांकि बेंच कहां बनेगी और उसका क्षेत्राधिकार क्या होगा, जैसे सवाल किसी औपचारिक प्रस्ताव और निर्णय के बाद ही स्पष्ट होंगे।
अब नजर अगले कदम पर
मेरठ की घटना ने लंबे समय से चल रही मांग को फिर सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है। वकीलों ने मुख्यमंत्री तक अपनी बात पहुंचा दी है, लेकिन अभी हाईकोर्ट बेंच की स्थापना तय नहीं हुई है। आगे इस मुद्दे पर क्या कदम उठता है, यह संबंधित संस्थाओं की औपचारिक प्रक्रिया से स्पष्ट होगा।