
- 1906 में टाटानगर स्टेशन के पास रेलकर्मियों ने शुरू की थी पूजा, 120 साल में सादगी से भव्यता तक पहुंचा दुर्गोत्सव
जमशेदपुर : जमशेदपुर शहर में दुर्गापूजा की पहचान आज भव्य पंडालों, आकर्षक थीम और शानदार सजावट से है। कहीं पंडालों पर लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, तो कहीं पारंपरिक बंगाली रीति-रिवाज से मां दुर्गा की आराधना की जा रही है। लेकिन शहर में पंडाल बनाकर दुर्गापूजा करने की शुरुआत बेहद साधारण तरीके से हुई थी। वर्ष 1906 में टाटानगर रेलवे स्टेशन के पास रेलकर्मियों ने मिलकर मां दुर्गा की पूजा शुरू की थी। उस दौर में चंदे की छोटी-छोटी रकम से आयोजन होता था। आज वही परंपरा 120 साल का सफर तय कर चुकी है और दुर्गोत्सव शहर की सांस्कृतिक पहचान बन गया है।
पांच रुपये के चंदे से शुरू हुई परंपरा
रेलवे ट्रैफिक कॉलोनी पूजा कमेटी के पूर्व सचिव विश्वजीत मुखर्जी के अनुसार, वर्ष 1906 में कालीमाटी रेलवे स्टेशन, जिसे आज टाटानगर स्टेशन के नाम से जाना जाता है, के पास स्टेशन मास्टर डी. सेनगुप्ता ने रेलकर्मियों के सहयोग से दुर्गापूजा की शुरुआत की थी। शुरुआत में आयोजन सीमित संसाधनों के बीच होता था। स्थानीय लोगों और रेलकर्मियों के सहयोग से चंदा जुटाकर पूजा की व्यवस्था की जाती थी। वर्ष 1913 में यह पूजा सार्वजनिक स्वरूप में आई। धीरे-धीरे इस परंपरा का विस्तार हुआ और शहर के विभिन्न इलाकों में पूजा समितियां बनने लगीं।
सादगी से भव्यता तक पहुंचा दुर्गोत्सव
जमशेदपुर दुर्गापूजा केंद्रीय समिति के पूर्व महासचिव रामबाबू सिंह के अनुसार, करीब तीन दशक पहले तक दुर्गापूजा के आयोजन में सादगी अधिक दिखाई देती थी। साधारण पंडाल में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की जाती थी। धूप-दीप, पारंपरिक पूजा और गाजे-बाजे के बीच श्रद्धालु मां की आराधना करते थे। उस समय पांच से 50 रुपये तक चंदा जुटाकर आयोजन किए जाने की परंपरा थी।
समय के साथ दुर्गापूजा के स्वरूप में बड़ा बदलाव आया। अब पूजा समितियां आकर्षक थीम, भव्य पंडाल, रोशनी और सजावट पर लाखों रुपये खर्च करती हैं। वर्तमान में शहर के प्रमुख पूजा पंडालों में से एक का अनुमानित बजट 50 लाख रुपये तक पहुंच गया है। हालांकि, इस बदलाव के बीच श्रद्धालुओं की आस्था और उत्साह पहले की तरह कायम है।
एक सदी से अधिक पुरानी हैं कई पूजा समितियां
जमशेदपुर में दुर्गापूजा की विरासत केवल 1906 में शुरू हुई पूजा तक सीमित नहीं है। शहर में कई ऐसी समितियां हैं, जिनका इतिहास एक सदी के आसपास या उससे अधिक पुराना है।
1. एसई रेलवे ट्रैफिक कॉलोनी दुर्गा, लक्ष्मी एवं काली पूजा समिति, बागबेड़ा: वर्ष 1906 में शुरुआत हुई। वर्ष 1913 में पूजा सार्वजनिक स्वरूप में आई।
2. जमशेदपुर पूजा कमेटी, साउथ पार्क: वर्ष 1919 में टाटा स्टील के कंपनी क्वार्टर के बरामदे में पूजा शुरू हुई। समिति ने 2018 में शताब्दी वर्ष मनाया।
3. ईवनिंग क्लब, गोलमुरी: क्लब की स्थापना 1925 में हुई और वर्ष 1933 से भव्य रूप से दुर्गापूजा की शुरुआत हुई। क्लब ने 2025 में शताब्दी वर्ष समारोह मनाया।
कहीं 50 लाख, तो कहीं 14 लाख तक बजट
शहर के प्रमुख पूजा पंडालों में आयोजन की भव्यता के साथ बजट भी चर्चा में रहता है। उपलब्ध अनुमान के अनुसार, आरडी भट्टा कॉन्ट्रैक्टर्स एरिया दुर्गापूजा कमेटी का बजट करीब 50 लाख रुपये, न्यू सिदगोड़ा दुर्गा एवं काली पूजा समिति का 35 लाख रुपये और हिंद बॉयज क्लब, रानीकुदर का लगभग 18 लाख रुपये है। वहीं, एग्रिको क्लब हाउस मैदान की पूजा का अनुमानित बजट 17 लाख रुपये और श्री सार्वजनिक दुर्गापूजा समिति, घोड़ाबांधा का करीब 14 लाख रुपये है।
जिले में वर्तमान में कुल 551 दुर्गापूजा समितियां हैं। इनमें 402 लाइसेंसी और 149 गैर-लाइसेंसी समितियां शामिल हैं। रामकृष्ण मिशन बिष्टुपुर, बेल्डीह कालीबाड़ी, नामदा बस्ती काली मंदिर, पारडीह काली मंदिर, रेलवे लोको कॉलोनी और मिलानी जैसे पूजा स्थलों पर पारंपरिक बंगाली रीति-रिवाज से आराधना की जाती है।
जमशेदपुर में दुर्गापूजा का स्वरूप भले ही बदल गया हो, लेकिन इसका मूल भाव आज भी सामूहिकता और आस्था से जुड़ा है। पहले सीमित संसाधनों के बीच स्थानीय लोग मिलकर आयोजन करते थे, जबकि अब पूजा समितियां भव्यता के साथ बेहतर व्यवस्था और श्रद्धालुओं की सुविधा पर भी ध्यान देती हैं। दुर्गापूजा अब धार्मिक आयोजन के साथ सामाजिक सहभागिता, सांस्कृतिक विरासत और शहर की पहचान का माध्यम बन चुकी है।
रामबाबू सिंह के अनुसार, समय के साथ आयोजन का स्वरूप बदलना स्वाभाविक है, लेकिन परंपरा और श्रद्धा को बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। 1906 में शुरू हुई यह यात्रा बताती है कि जमशेदपुर की दुर्गापूजा केवल पंडालों की भव्यता की कहानी नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था और सामूहिक सहयोग की विरासत भी है।