जमशेदपुर के स्कूलों की मनमानी पर लगाम कब तक ?
अभिभावकों पर बढ़ता आर्थिक बोझ और प्रशासन मौन !
जमशेदपुर में शिक्षा के नाम पर निजी स्कूलों की मनमानी लगातार बढ़ती जा रही है। हर साल नई-नई किताबें बदल देना, प्रत्येक कक्षा में एडमिशन और रि-एडमिशन के नाम पर अलग-अलग शुल्क वसूलना और फीस में लगातार भारी बढ़ोतरी करना अब आम बात हो गई है। इसका सीधा असर अभिभावकों की जेब पर पड़ रहा है। शिक्षा, जो समाज के विकास का आधार होती है, आज कई निजी स्कूलों के लिए कमाई का साधन बनती जा रही है, जो अत्यंत चिंताजनक है।
हर साल नई किताबें – अभिभावकों पर अतिरिक्त बोझ
अधिकांश निजी स्कूल हर वर्ष सिलेबस में छोटे-मोटे बदलाव का हवाला देकर नई किताबें खरीदने के लिए बाध्य करते हैं। पुराने सत्र की किताबें, जो पूरी तरह उपयोगी होती हैं, रद्दी में चली जाती हैं। इससे न केवल अभिभावकों पर आर्थिक बोझ बढ़ता है, बल्कि कागज की अनावश्यक बर्बादी भी होती है, जो पर्यावरण के लिए भी हानिकारक है।
एडमिशन और रि-एडमिशन शुल्क – क्या यह जरूरी है?
हर नए क्लास में एडमिशन या रि-एडमिशन के नाम पर अलग शुल्क लेना शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। एक बार स्कूल में नामांकन होने के बाद बार-बार एडमिशन शुल्क लेना किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता। कई अभिभावक मजबूरी में यह शुल्क देते हैं, क्योंकि उनके पास विकल्प सीमित होते हैं।
फीस में लगातार बढ़ोतरी – आम परिवार पर असर
हर वर्ष फीस में बढ़ोतरी से मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के परिवार सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। शिक्षा का अधिकार सभी बच्चों के लिए समान होना चाहिए, लेकिन बढ़ती फीस के कारण कई परिवार अच्छे स्कूल में पढ़ाने से वंचित हो जाते हैं।

सरकारी स्कूलों में संसाधन की कमी और ,व्यवस्था कमजोर !
दूसरी ओर, सरकारी स्कूलों में भवन, मैदान और पर्याप्त जगह उपलब्ध है, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता और व्यवस्था पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। यदि सरकारी स्कूलों में बेहतर शिक्षक, आधुनिक पढ़ाई की व्यवस्था और इंग्लिश मीडियम की सुविधा उपलब्ध कराई जाए, तो बड़ी संख्या में अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजना पसंद करेंगे।
इंग्लिश मीडियम सरकारी स्कूल – समाधान की दिशा
यदि सरकार सरकारी स्कूलों को चरणबद्ध तरीके से इंग्लिश मीडियम में परिवर्तित करे और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए सख्त निगरानी व्यवस्था लागू करे, तो निजी स्कूलों की मनमानी पर स्वतः रोक लग सकती है। इससे शिक्षा सस्ती और सुलभ होगी तथा अभिभावकों को अनावश्यक आर्थिक बोझ से राहत मिलेगी।
पारदर्शिता और नियमों का पालन जरूरी
शिक्षा विभाग को निजी स्कूलों के फीस ढांचे, किताबों के चयन और अन्य शुल्कों पर स्पष्ट नियम बनाकर सख्ती से पालन करवाना चाहिए। स्कूलों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे शिक्षा को व्यवसाय नहीं, बल्कि सेवा के रूप में देखें।
