
सूर्य देव और छठी मैया की उपासना में डूबे श्रद्धालु, 36 घंटे के कठिन निर्जला व्रत का पालन
चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में मनाया जाने वाला आस्था का महापर्व चैती छठ आज से शुरू हो चुका है। चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व में श्रद्धालु पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ सूर्य देव और छठी मैया की आराधना करते हैं। यह पर्व 22 मार्च से 25 मार्च तक मनाया जा रहा है।
नहाय – खाय
22 मार्च को नहाय-खाय के साथ इस महापर्व की शुरुआत हुई। श्रद्धालु पवित्र नदियों या जलाशयों में स्नान कर शुद्ध सात्विक भोजन, विशेष रूप से कद्दू-भात ग्रहण करते हैं। इस दिन से घर और मन दोनों की शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है।
खरना
23 मार्च को खरना मनाया जा रहा है। इस दिन व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखते हैं और शाम को गुड़ की खीर का प्रसाद बनाकर भगवान को अर्पित करते हैं। इसके बाद यही प्रसाद ग्रहण कर 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू होता है।
संध्या अर्घ्य
24 मार्च को डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। घाटों पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ेगी और लोग पानी में खड़े होकर अस्ताचलगामी सूर्य की उपासना करेंगे।
उषा अर्घ्य और पारण
25 मार्च को उगते सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही इस महापर्व का समापन होगा। इसके बाद व्रती पारण कर अपना व्रत पूर्ण करेंगे।
महत्व और मान्यता
चैती छठ को वसंतकालीन छठ भी कहा जाता है। मान्यता है कि भगवान राम और माता सीता ने अयोध्या लौटने के बाद चैत्र माह में सूर्य पूजा की थी। यह पर्व सुख, समृद्धि, निरोगी जीवन और परिवार की खुशहाली के लिए किया जाता है।
पूजा सामग्री और नियम
इस दौरान ठेकुआ, कसार, मौसमी फल, गन्ना और पीतल के सूप का विशेष महत्व होता है। छठ पर्व में शारीरिक और मानसिक शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है, जो इसे अन्य व्रतों से अलग बनाता है।
कठिन तपस्या और अटूट आस्था का यह पर्व समाज में सकारात्मक ऊर्जा और एकता का संदेश देता है। चैती छठ के अवसर पर घाटों और घरों में भक्ति का माहौल देखने को मिल रहा है।
