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जमशेदपुर में आदिवासी सेंगेल अभियान ने एक बार फिर आदिवासी समुदाय के धार्मिक अधिकारों और पहचान को लेकर जोरदार आवाज उठाई है। संगठन की ओर से देश के राष्ट्रपति को एक महत्वपूर्ण मांग पत्र सौंपा गया है, जिसमें सरना धर्म को आधिकारिक मान्यता देने की मांग प्रमुख रूप से रखी गई है।
इससे पहले अभियान से जुड़े लोगों ने साकची आमबगान मैदान से जिला मुख्यालय तक एक विशाल रैली निकाली और जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि देश के लगभग 15 करोड़ आदिवासी, जिन्हें संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्राप्त है, आज भी अपने धर्म की अलग पहचान से वंचित हैं।
अभियान के नेता सोनाराम सोरेन ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत आदिवासियों को उनके पारंपरिक ‘सरना धर्म’ की मान्यता मिलनी चाहिए। साथ ही उन्होंने 2021 से 2027 की जनगणना में सरना धर्म के लिए अलग कॉलम कोड शामिल करने की भी मांग उठाई।
आंदोलनकारियों का कहना है कि आदिवासी समुदाय प्रकृति पूजक है और उनकी आस्था जंगल, पहाड़, नदी, पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं से जुड़ी है। यह जीवनशैली पर्यावरण संतुलन पर आधारित है, जिसे एक अलग धर्म के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए।
इसके अलावा झारखंड और पश्चिम बंगाल के प्रमुख आदिवासी धार्मिक स्थलों—गिरिडीह स्थित मरांग बुरु यानी पारसनाथ पहाड़ और बांकुड़ा के लुगुबुरु—को अन्य धर्मों के अतिक्रमण से मुक्त कराने की भी मांग भी इस ज्ञापन में शामिल है।
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