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धर्मेंद्र कुमार, दिल्ली: भारतीय लोकतंत्र के तथाकथित अमृतकाल में देश का युवा अपने भविष्य व अधिकार को लेकर सड़क पर आंदोलनरत है। सरकार की लगातार बेरुखी एवं सड़े हुए सिस्टम का दंश झेल रहे युवाओं के सब्र का बांध तब टूट गया, जब अपने अधिकारों के लिए आवाज बुलंद कर रहे युवाओं को कॉकरोच जैसे शब्दों से नवाजा गया। देश की युवा पीढ़ी ने इसे चुनौती के तौर पर स्वीकार करते हुए कहा कि हां, हम उसी सड़े गले सिस्टम और सरकार की गलत नीतियों की उपज हैं। देश के युवाओं का मनोबल आज जिस गहराई तक टूट चुका है, वह केवल सरकार की नीतियों की विफलता नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की जड़ता और संवेदनहीनता का परिणाम है। लगातार अत्याचार, बेरोजगारी, शिक्षा में गिरावट और अवसरों की कमी ने युवाओं को हताश व निराश कर दिया है। इतिहास गवाह है कि जब भी देश की युवा पीढ़ी ने अंगड़ाई ली, सत्ता परिवर्तन हो गया। चाहे स्वतंत्रता का आंदोलन हो या जेपी का आंदोलन।

राजनीतिक दलों से मोहभंग

राजनीतिक दलों द्वारा सत्ता में आने से पहले युवाओं से रोजगार, शिक्षा और अवसरों के वादे किए जाते हैं, लेकिन सत्ता हासिल करने के बाद वही वादे हवा हवाई हो जाते हैं। भर्ती परीक्षाओं में धांधली, परिणामों में देरी, और भ्रष्टाचार ने युवाओं के भविष्य को अंधकारमय बना दिया है। आंदोलन करने वाले युवाओं पर दमन, उनकी आवाज़ दबाने की कोशिश, और समस्याओं की लीपापोती, यह सब मिलकर युवाओं को और अधिक निराश कर रहा है। युवा पीढ़ी ने जहां एक तरफ कांग्रेस का राज देखा तो वहीं दूसरी तरफ 12 साल से भाजपा का शासन देख रही है। चेहरा बदला, नारे बदले, झंडे बदले—पर सिस्टम? सिस्टम वही सड़ा-गला ढांचा है जिसमें फाइल दबती है, और भविष्य लीक होता है। युवाओं ने देखा है कि पारंपरिक राजनीतिक दल उनके दर्द को केवल चुनावी मुद्दा बनाते हैं। वोट मांगते समय रोजगार और शिक्षा की बात होती है, लेकिन सत्ता में आने के बाद वही मुद्दे हाशिये पर चले जाते हैं। यही कारण है कि अब युवाओं का भरोसा इन दलों से उठ चुका है। ऐसे युवाओं को एक नए राजनीतिक विकल्प की तलाश है।

तीसरे विकल्प की जरूरत क्यों?

कांग्रेस ने ‘गरीबी हटाओ’ कहा, गरीबी नहीं हटी। भाजपा ने ‘भ्रष्टाचार मिटाओ’ कहा, पेपर लीक नेशनल स्पोर्ट बन गया। समस्या विचारधारा की नहीं, सिस्टम की है। जब तक भर्ती आयोग, परीक्षा एजेंसी, संवैधानिक संस्थाओं एवं पुलिस-प्रशासन की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक कोई भी दल आए, नतीजा वही रहेगा। आज युवाओं को एक ऐसे विकल्प की तलाश है जो उनकी आवाज को बुलंद करे, उनके भविष्य के लिए एक बेहतर वातावरण तैयार करे।

तीसरे विकल्प की तलाश

इस पृष्ठभूमि में “कॉकरोच जनता पार्टी” का आगाज़ युवाओं के लिए एक प्रतीक बनकर उभर रहा है। यह नाम भले ही असामान्य लगे, लेकिन इसका सार यही है कि यह पार्टी उन युवाओं की आवाज़ बने जो बार-बार कुचले गए हैं, फिर भी जीवटता से खड़े हैं। यह विकल्प सरकार विरोधी आंदोलन से कहीं अधिक सड़े-गले सिस्टम के विरोध में है। इसका उद्देश्य युवाओं के लिए एक ऐसा मंच तैयार करना है जो उनके दर्द को समझे और उनके भविष्य के लिए बेहतर वातावरण बनाए। यह पार्टी युवाओं को केवल वोट बैंक नहीं, बल्कि देश की रीढ़ मानकर उनके लिए शिक्षा, रोजगार और अवसरों की नई राह खोले। आज का युवा परिवर्तन की तलाश में है। “कॉकरोच जनता पार्टी” उस तलाश का प्रतीक है। एक ऐसा तीसरा विकल्प जो युवाओं की आवाज़ को बुलंद करे और उनके सपनों को साकार करने की दिशा में ठोस कदम उठाए। यह आंदोलन केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का भी संकेत है। सत्ता को समझना होगा कि ‘कॉकरोच’ गाली नहीं बल्कि वह आइना जिसमें भ्रष्ट सिस्टम औऱ सरकार की गैर जिम्मेदारी के अक्स दिखाई पड़ते है। जब तक सिस्टम में गंदगी रहेगी, कॉकरोच पैदा होते रहेंगे। उन्हें मारने से नहीं बल्कि सिस्टम में आमूल चूल परिवर्तन ही इस समस्या का असली समाधान है। यदि सिस्टम ने युवाओं की पुकार को अनसुना किया, तो यह तीसरा विकल्प आने वाले समय में देश की राजनीति की नई धुरी बन सकता है।

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