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शुभम कुमार पति,
पीएचडी शोधार्थी, शिक्षा विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय

“परीक्षा ने हमें निराश नहीं किया है, पूरी व्यवस्था ने किया है।” – झारखंड में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रही एक अभ्यर्थी की यह बात आज की भर्ती व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना सामने रखती है। वर्षों तक तैयारी करने के बाद युवा परीक्षा देता है, परिणाम की प्रतीक्षा करता है और फिर उसे कभी पेपर लीक, कभी परीक्षा में गड़बड़ी और कभी परीक्षा रद्द होने की खबर मिलती है। हाल के वर्षों में प्रतियोगी परीक्षाओं की गड़बड़ियों ने शिक्षा और भर्ती व्यवस्था की कमियों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है। इसके साथ ही नियुक्ति व्यवस्था की अव्यवस्था भी स्पष्ट रूप से सामने आई है। इस अव्यवस्था के कारण उस ‘भरोसे’ पर भी प्रश्नचिन्ह लगता है जिसके आधार पर लाखों युवा अपने जीवन के कई वर्ष सरकारी नौकरी की तैयारी में लगाते हैं। यह भरोसा संविधान में निहित समान अवसर के वादे, विद्यालय से मिली शिक्षा और शासन-व्यवस्था की निष्पक्षता से धीरे-धीरे निर्मित होता है।

इस ‘भरोसे’ के अंतर्गत पहला मूल्य निष्पक्षता है। किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की पहली शर्त उसकी निष्पक्षता होती है। प्रश्नपत्र की सुरक्षा से लेकर परीक्षा केंद्र की निगरानी, उत्तर पुस्तिका की सुरक्षा और परिणाम तैयार करने तक हर चरण में सावधानी जरूरी है। हाल के वर्षों में अलग-अलग राज्यों और राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं को लेकर सामने आए विवाद इस व्यवस्था की कमजोरियों की ओर संकेत करते हैं। परीक्षा में गड़बड़ी की शिकायत सामने आने के बाद जांच और कार्रवाई जरूरी है, परन्तु इससे भी बड़ा सवाल यह है कि ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों हुई और निरंतर पैदा क्यों हो रही है। लाखों युवाओं से परीक्षा शुल्क लेने और उनसे वर्षों की तैयारी की अपेक्षा करने वाली व्यवस्था को परीक्षा की शुचिता की जिम्मेदारी भी उतनी ही गंभीरता से निभानी होगी।

दूसरा मूल्य विश्वसनीयता है

प्रतियोगी परीक्षा के पीछे अभ्यर्थी का समय, पैसा, मेहनत और भविष्य जुड़ा होता है। इसलिए किसी परीक्षा पर सवाल उठना युवाओं के विश्वास का संकट भी है। लेकिन प्रशासन या राज्य किसी परीक्षा पर सवाल उठाने का मौका क्यों देते हैं? हाल ही के वर्षों में कई राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर के परीक्षाओं को प्रशासित करने की प्रक्रिया में कई समानता देखी जा सकती है। कई पालियों में परीक्षा होने पर नॉर्मलाइजेशन की प्रक्रिया अपनाई जाती है, लेकिन इसके आधार, गणना और प्रभाव को लेकर पर्याप्त पारदर्शिता न होने पर अभ्यर्थियों के बीच संदेह पैदा होता है। इसी तरह कट-ऑफ, व्यक्तिगत अंक और परिणाम से जुड़ी सूचनाओं के प्रकाशन में देरी भी विश्वसनीयता को प्रभावित करती है। बार-बार परीक्षा में अनियमितता की शिकायत, परिणाम में देरी या परीक्षा रद्द होने की स्थिति युवाओं को यह सोचने पर मजबूर करती है कि उनकी मेहनत का अंतिम फैसला योग्यता से होगा या व्यवस्था की किसी गलती से। ऐसी स्थिति लंबे समय में पूरी भर्ती प्रणाली की विश्वसनीयता को कमजोर करती है।

तीसरा मूल्य न्यायसंगतता है

परीक्षा में किसी गड़बड़ी की स्थिति पैदा होने पर उसके समाधान की प्रक्रिया न्यायसंगत होनी चाहिए। अगर कुछ अभ्यर्थियों या किसी परीक्षा एजेंसी की गलती से पूरी परीक्षा संदेह के घेरे में आती है तब सबसे बड़ा सवाल होता है कि उस गड़बड़ी की कीमत कौन चुकाएगा। यह नैतिक द्वन्द हालिया जेएसएससी-सीजीएल की परीक्षा के संदर्भ में भी देखा जा सकता है। परीक्षा प्रक्रिया में अगर अनियमितता हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और जिम्मेदार लोगों की पहचान की जानी चाहिए। लेकिन जांच के परिणाम में हजारों अभ्यर्थियों की मेहनत को एक झटके में निरर्थक मान लेना न्यायसंगत नहीं हो सकता। न्यायसंगतता के मूल्य को सुनिश्चित करने के लिए प्रशासन द्वारा गड़बड़ी की प्रकृति और उसके प्रभाव को समझने का प्रयास करना चाहिए। क्या अनियमितता पूरी परीक्षा को प्रभावित करती है या उसका प्रभाव सीमित है? क्या निर्दोष अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा करते हुए कोई वैकल्पिक व्यवस्था बनाई जा सकती है? ऐसे सवालों का जवाब तलाशे बिना लिया गया निर्णय व्यवस्था के प्रति भरोसे को और कमजोर कर सकता है।

चौथा मूल्य समयबद्धता है

भर्ती प्रक्रिया में समयबद्धता भी भरोसे का एक जरूरी आधार है। विज्ञापन से लेकर परीक्षा, परिणाम, दस्तावेज सत्यापन और नियुक्ति तक हर चरण के लिए स्पष्ट समयसीमा होनी चाहिए। वर्षों तक चलने वाली भर्ती प्रक्रिया अभ्यर्थियों से उनका समय, अवसर और मानसिक ऊर्जा मांगती है। विवाद या जांच की स्थिति में भी निर्णय अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रहना चाहिए। युवा की उम्र और अवसर लौटाए नहीं जा सकते इसलिए भर्ती में देरी भी एक तरह का अन्याय है।

पांचवां मूल्य जवाबदेही है

भरोसा तभी कायम रह सकता है जब गलती होने पर जिम्मेदारी तय हो। परीक्षा में पेपर लीक, तकनीकी गड़बड़ी या प्रक्रिया संबंधी लापरवाही होने पर परीक्षा रद्द कर देना ही पर्याप्त नहीं है। परीक्षा रद्द कर देना कार्रवाई का अंत नहीं होना चाहिए। इसके बाद भी कुछ बुनियादी सवालों के जवाब जरूरी हैं: गलती कहाँ हुई, उसके लिए कौन जिम्मेदार था, और भविष्य में ऐसी स्थिति रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए? परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था से लेकर संबंधित अधिकारियों और एजेंसियों तक जवाबदेही तय होना जरूरी है, क्योंकि जिम्मेदारी के बिना सुधार की कोई भी प्रक्रिया अधूरी रहेगी।

तमाम परीक्षाओं के पीछे उन युवाओं के सपने हैं, जिन्होंने वर्षों तक अपनी नींद, समय और अवसर लगाकर तैयारी की है। सरकार को यह समझना होगा कि एक परीक्षा रद्द होने से किसी युवा के जीवन का एक हिस्सा बीत जाता है। किसी ने परिवार की आर्थिक मुश्किलों के बीच तैयारी की है। किसी ने दूसरी नौकरी और अवसर छोड़कर इस परीक्षा पर भरोसा किया है। ऐसे में परीक्षा की एक गलती उनके भीतर व्यवस्था पर बना भरोसा तोड़ती है। सरकार से इन युवाओं की सबसे बड़ी अपेक्षा यही है कि उनकी मेहनत को आंकड़ों और फाइलों के बीच न देखा जाए। उसे एक जीवन की मेहनत के रूप में समझा जाए। इसलिए भर्ती व्यवस्था में उस भरोसे को बचाना जरूरी है जिसके सहारे लाखों युवा अपने भविष्य की ओर देखते हैं।

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