
पलामू: झारखंड के पलामू जिले से करीब 40 से 50 मजदूरों को बेहतर मजदूरी और रोजगार का झांसा देकर दूसरे राज्य ले जाने का मामला सामने आया है। नीलांबर-पीतांबरपुर प्रखंड के शाहद गांव के रहने वाले इन मजदूरों के परिजनों ने आरोप लगाया है कि उन्हें मध्य प्रदेश के जबलपुर में भवन निर्माण का काम और करीब 600 रुपये प्रतिदिन मजदूरी दिलाने की बात कहकर ले जाया गया था, लेकिन उन्हें कर्नाटक पहुंचा दिया गया।
परिजनों के मुताबिक, मजदूरों को कर्नाटक के मरचाकनहैली क्षेत्र के बसवेगोड़ा में गन्ने के खेतों में काम कराया जा रहा है। उनसे सुबह करीब छह बजे से शाम छह बजे तक गन्ना काटने, छीलने और ट्रैक्टर-ट्रॉली में लोड करने का काम लिए जाने का आरोप है। मजदूरों में महिलाएं, किशोरियां, अधेड़ उम्र के लोग और कुछ नाबालिग भी शामिल होने की बात कही जा रही है।
जबलपुर के बजाय कर्नाटक ले जाने का आरोप
परिजनों के अनुसार, करीब एक महीने पहले शाहद गांव की लक्ष्मी कुमारी और पाटन निवासी डिक्की सिंह मजदूरों को काम दिलाने के नाम पर बाहर ले गए थे। उन्हें बताया गया था कि जबलपुर में भवन निर्माण का काम मिलेगा और प्रतिदिन करीब 600 रुपये मजदूरी दी जाएगी।
हालांकि, परिजनों का आरोप है कि मजदूरों को जबलपुर ले जाने के बजाय कर्नाटक पहुंचा दिया गया। वहां उन्हें गन्ने के खेतों में काम पर लगा दिया गया। मजदूरों के परिजनों ने अंकज कुमार भुइयां, ओमप्रकाश कुमार, किरण कुअर, उषा देवी, आयुष कुमार, बजरंगी कुमार, बंटी कुमार, भीमल भुइयां, सुशीला देवी, राहुल कुमार, छोटन कुमार, कविता कुमारी, संजय भुइयां, सुरति कुमारी, विजय कुमार, अंजली कुमारी, पूजा कुमारी, सुषमा कुमारी और चनका कुमारी समेत अन्य मजदूरों की सुरक्षित वापसी की मांग की है।
12 घंटे काम कराने और मारपीट का आरोप
परिजनों ने आरोप लगाया है कि मजदूरों से लगातार करीब 12 घंटे काम कराया जा रहा है। बीमारी या शारीरिक परेशानी के कारण काम नहीं कर पाने पर उनके साथ मारपीट किए जाने का भी दावा किया गया है।
बताया गया है कि मजदूरों को गन्ने के खेत में ही टेंट लगाकर रखा गया है। परिजनों का आरोप है कि उनके भागने की आशंका में रात के समय निगरानी भी की जाती है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।
घर लौटने के लिए ₹25 हजार मांगने का दावा
मजदूरों के परिजनों के अनुसार, जब कुछ मजदूरों ने घर वापस लौटने की इच्छा जताई तो कथित तौर पर उनसे करीब 25 हजार रुपये की मांग की गई। आरोप है कि मजदूरों को बताया गया कि उन्हें बाहर ले जाने, रहने और खाने-पीने में यह राशि खर्च हुई है और पैसे देने के बाद ही उन्हें वापस जाने दिया जाएगा।
यदि जांच में मजदूरों को जबरन रोकने, उनकी आवाजाही पर प्रतिबंध लगाने या उनकी इच्छा के विरुद्ध काम कराने के आरोप सही पाए जाते हैं, तो मामला गंभीर श्रम शोषण और मानव तस्करी से जुड़े पहलुओं तक पहुंच सकता है।
ठेकेदार ने बंधक बनाने के आरोपों से किया इनकार
मजदूरों को ले जाने वाले ठेकेदार डिक्की सिंह ने फोन पर बातचीत में बंधक बनाए जाने और मारपीट के आरोपों से इनकार किया। उनका कहना था कि सभी मजदूर काम कर रहे हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनकी थाना प्रभारी और लेबर सुपरिटेंडेंट से बातचीत हो चुकी है। इसके बाद उन्होंने फोन काट दिया।
परिजन पहुंचे थाने, सुरक्षित वापसी की मांग
मजदूरों के परिजन अपने परिवार के सदस्यों की सुरक्षित वापसी की मांग को लेकर लेस्लीगंज थाने पहुंचे और थाना प्रभारी के समक्ष पूरे मामले की जानकारी दी।
लेस्लीगंज थाना प्रभारी उत्तम कुमार राय ने बताया कि मजदूरों के परिजन थाने पहुंचे थे। मजदूरों को ले जाने वाली लक्ष्मी कुमारी से भी बातचीत की गई है। थाना प्रभारी के अनुसार, लक्ष्मी का कहना है कि मजदूरों को बाहर ले जाने में प्रति व्यक्ति करीब 2,200 रुपये खर्च हुए हैं और जो मजदूर वापस लौटना चाहते हैं, वे यह राशि देकर घर जा सकते हैं।
थाना प्रभारी ने यह भी कहा कि यदि मजदूरों के परिजन स्वयं कर्नाटक जाकर अपने लोगों को वापस लाना चाहते हैं तो पुलिस के एक-दो अधिकारियों को उनके साथ भेजने की व्यवस्था की जा सकती है।
प्रवासी श्रमिक कल्याण बोर्ड ने शुरू की पहल
प्रवासी श्रमिक कल्याण बोर्ड की शिखा ने बताया कि संबंधित मजदूर बेंगलुरु से करीब 300 किलोमीटर दूर बताए जा रहे हैं। स्थानीय पुलिस से संपर्क करने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि एक-दो दिनों में मजदूरों को वापस लाने की दिशा में कार्रवाई हो सकती है।
विधायक और श्रम विभाग से भी मदद की गुहार
मजदूरों के परिजनों ने मामले में माले विधायक विनोद सिंह से भी मदद की गुहार लगाई है। इसके अलावा लेबर सुपरिटेंडेंट अमित कुमार चौधरी और प्रवासी श्रमिक कल्याण विभाग को भी आवेदन देकर मजदूरों की सुरक्षित वापसी की मांग की गई है।
परिजनों का कहना है कि प्रशासन को केवल मजदूरों की वापसी सुनिश्चित करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि पूरे मामले की जांच करनी चाहिए। यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि मजदूरों को किसके माध्यम से बाहर ले जाया गया, उन्हें क्या काम और कितनी मजदूरी का आश्वासन दिया गया था और वास्तविकता में उनसे किस तरह का काम कराया जा रहा है।
नाबालिग मजदूरों के दावे ने बढ़ाई चिंता
मजदूरों में नाबालिगों और किशोरियों के शामिल होने के आरोप ने मामले को और गंभीर बना दिया है। ऐसे में प्रशासन के सामने सबसे पहले सभी मजदूरों की पहचान और उम्र का सत्यापन कर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने की चुनौती है। साथ ही कथित श्रम शोषण, मारपीट और जबरन काम कराने के आरोपों की निष्पक्ष जांच भी जरूरी है।
फिलहाल पलामू में मजदूरों के परिजन अपने परिवार के सदस्यों की सुरक्षित वापसी का इंतजार कर रहे हैं। स्थानीय प्रशासन और प्रवासी श्रमिक कल्याण विभाग की ओर से कर्नाटक पुलिस से संपर्क की कोशिश की जा रही है। अब निगाह इस बात पर है कि प्रशासन मजदूरों को कितनी जल्दी सुरक्षित वापस लाता है और आरोपों की जांच में क्या कार्रवाई सामने आती है।