
जमशेदपुर: छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध पंडवानी लोकगायिका तीजन बाई के निधन पर साहित्यकार धर्मेंद्र कुमार ने उन्हें भारतीय लोक संस्कृति का सशक्त प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि तीजन बाई ने अपनी बुलंद आवाज और अद्भुत प्रस्तुति शैली से महाभारत की कथाओं को देश-विदेश के मंचों तक पहुंचाया। 5 जुलाई 2026 को रायपुर एम्स में उनके निधन के साथ लोक कला का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया।
24 अप्रैल 1956 को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मी तीजन बाई ने बचपन में अपने नाना से पंडवानी सीखी। मात्र 13 वर्ष की उम्र में उन्होंने पहली सार्वजनिक प्रस्तुति दी। उस दौर में पंडवानी पर पुरुषों का वर्चस्व था, लेकिन उन्होंने सामाजिक विरोध के बावजूद अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी वेदमती और कापालिक शैली की प्रस्तुतियों ने लाखों लोगों को प्रभावित किया। लोक कला के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण तथा संगीत नाटक अकादमी सम्मान से नवाजा गया।
धर्मेंद्र कुमार ने बताया कि तीजन बाई का जमशेदपुर से भी विशेष जुड़ाव था। 1970 के दशक में उन्होंने बर्मामाइन्स के एस-टाइप मैदान में पहली प्रस्तुति दी थी, जबकि वर्ष 2014 में संस्कृति संगम कार्यक्रम में भी उन्होंने अपनी यादगार प्रस्तुति से दर्शकों का मन मोह लिया था।
उन्होंने कहा कि तीजन बाई ने साबित किया कि लोक कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का माध्यम है। उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को भारतीय लोक संस्कृति से जोड़ती है।
