
जमशेदपुर: लोककला पंडवानी को देश-दुनिया में नई पहचान दिलाने वाली पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का रविवार (5 जुलाई 2026) को रायपुर में निधन हो गया। उनके निधन से लोकसंगीत और भारतीय सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर है। वे 69 वर्ष की थीं। उनके जाने के साथ ही पंडवानी के मंचीय गायन का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया। 7 सितंबर 1956 को छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी गांव में परधान (गोंड जनजाति) परिवार में जन्मी तीजन बाई का नाम तीजा पर्व के दिन जन्म लेने के कारण रखा गया था। बचपन में उन्होंने अपने नाना ब्रजलाल से पंडवानी गायन की शिक्षा ली। सामाजिक और पारिवारिक विरोध के बावजूद उन्होंने अपनी कला का दामन नहीं छोड़ा। कम उम्र में विवाह होने के बाद भी उन्होंने संघर्ष करते हुए पंडवानी को अपनी पहचान बनाया।
तीजन बाई ने महाभारत की कथाओं को अपनी दमदार आवाज, प्रभावशाली अभिनय और विशिष्ट कापालिक शैली में प्रस्तुत कर पंडवानी को वैश्विक मंच तक पहुंचाया। तानपुरे को कभी अर्जुन का गांडीव तो कभी भीम की गदा बनाकर पात्रों को जीवंत कर देने की उनकी अद्भुत शैली ने लाखों श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। उनकी प्रतिभा को सबसे पहले प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने पहचाना और उन्हें राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। दिल्ली में एक प्रस्तुति के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें गले लगाकर सम्मानित किया था। बाद में निर्माता-निर्देशक श्याम बेनेगल के चर्चित धारावाहिक भारत एक खोज में उनकी प्रस्तुति ने उन्हें देशभर में लोकप्रिय बना दिया। भारतीय संस्कृति और लोककला में उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें 1988 में पद्मश्री, 2003 में पद्मभूषण और 2019 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। डॉ. तीजन बाई ने सिद्ध कर दिया कि लोककला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, इतिहास और परंपरा की जीवंत विरासत है। उनका जीवन संघर्ष, साधना और समर्पण की प्रेरक गाथा के रूप में हमेशा याद किया जाएगा। उनके निधन से भारतीय लोकसंगीत जगत ने अपनी सबसे बुलंद आवाजों में से एक को खो दिया।