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धर्मेंद्र कुमार,पटना: बिहार की राजनीति में 3 अगस्त 2026 का दिन एक ऐतिहासिक बदलाव के रूप में दर्ज हो गया है। लगभग तीन दशकों से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का अभेद्य गढ़ रही बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में प्रशांत किशोर (पीके) ने न केवल अपनी पहली प्रत्यक्ष चुनावी परीक्षा पास की, बल्कि बड़े अंतर से जीत दर्ज कर बिहार में ‘तीसरे विकल्प’ को हकीकत में बदल दिया है।

आंकड़ों के आईने में बांकीपुर का संग्राम
बांकीपुर उपचुनाव के आंकड़े जन सुराज की एकतरफा लहर और पारंपरिक दलों की विफलता को साफ दर्शाते हैं। इस उपचुनाव में जन सुराज पार्टी के प्रशांत किशोर कुल 63,203 वोट प्राप्त कर विजयी रहे, वहीं भाजपा के नीरज कुमार सिन्हा को कुल 44,250 वोट मिला जबकि राजद की प्रत्याशी रेखा कुमारी को मात्र 14,085 वोट पर ही संतोष करना पड़ा। इस उपचुनाव में 34.30% मतदान हुआ था। कम मतदान के बावजूद 18,953 वोटों के बड़े अंतर से प्रशांत किशोर की जीत यह साबित करती है कि जो भी मतदाता पोलिंग बूथ तक पहुंचे, उन्होंने पारंपरिक राजनीति के खिलाफ एकतरफा वोट किया।

Gen Z का आंदोलन रहा बड़ा फैक्टर
इस चुनाव का सबसे क्रांतिकारी पहलू बांकीपुर के युवा मतदाताओं, विशेषकर Gen Z (18 से 26 वर्ष के युवा) की अप्रत्याशित भागीदारी रही। पीके की जीत महज एक राजनीतिक उलटफेर नहीं, बल्कि युवाओं के एक मूक आंदोलन का परिणाम है। बांकीपुर के कोचिंग सेंटरों और सोशल मीडिया पर युवा वर्ग ने जन सुराज के “राइट टू एजुकेशन और रोजगार” के नारे को एक डिजिटल आंदोलन बना दिया। बिहार की पारंपरिक ‘जाति-आधारित’ वोटिंग को इस युवा पीढ़ी ने पूरी तरह नकार दिया। इन्होंने रोजगार के लिए होने वाले पलायन को मुख्य मुद्दा बनाया और पीके के विजन को हाथों-हाथ लिया। फर्स्ट-टाइम वोटर्स ने भाजपा के पारंपरिक राष्ट्रवाद और राजद के पुराने सामाजिक न्याय के फॉर्मूले से हटकर ‘भविष्य की राजनीति’ को चुना। दिल्ली और बिहार के पटना में छात्रों पर हुई बरबर्तापूर्ण कार्रवाई के कारण युवा वर्ग कहीं न कहीं बीजेपी से नाराज था और उसने अपनी नाराजगी वोट के माध्यम से व्यक्त कर दी। बांकीपुर में कुल मतदाताओं का लगभग एक तिहाई युवा मतदाता हैं। बांकीपुर का परिणाम यह बताता है कि युवाओं ने खुल कर भाजपा के खिलाफ जन सुराज के पक्ष में मतदान किया है।

भाजपा का किला ध्वस्त
बांकीपुर सीट वर्ष 1995 से भाजपा का सबसे सुरक्षित गढ़ मानी जाती थी। नितिन नवीन के राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई इस सीट पर भाजपा की यह हार केवल एक उपचुनाव की हार नहीं है, बल्कि उसके शहरी कोर-वोट बैंक में युवाओं द्वारा लगाई गई बड़ी सेंधमारी है। भाजपा को यह गुमान था कि बांकीपुर सीट से किसी को भी खड़ा कर देंगे तो हमारी ही जीत होगी। इस बार बांकीपुर की जनता में बीजेपी के इस भ्रम को तोड़ दिया है। वहीं दूसरी ओर मुख्य विपक्षी दल राजद महज 14,085 वोटों पर सिमटकर तीसरे स्थान पर रहा, जो उसकी अप्रासंगिकता को दर्शाता है।
बांकीपुर का यह परिणाम बिहार की आगामी राजनीति के लिए एक ‘टर्निंग पॉइंट’ माना जा रहा है। प्रशांत किशोर ने अपने पहले ही आधिकारिक चुनावी मुकाबले में जीत का खाता खोलकर यह संदेश दे दिया है कि वह सत्ता की मुख्य दावेदार हैं। इस जीत से राज्य के आगामी विधानसभा चुनावों में त्रिकोणीय मुकाबले की पृष्ठभूमि तैयार हो गई है, जिससे स्थापित दलों के पुराने समीकरण ध्वस्त हो सकते हैं।
बांकीपुर उपचुनाव का जनादेश
बिहार की राजनीति में जातिवाद और पारंपरिक ढर्रे के खिलाफ युवाओं का एक कड़ा संदेश है। प्रशांत किशोर ने युवाओं के भरोसे और भाजपा के गढ़ में सेंध लगाकर यह साबित कर दिया है कि यदि विकल्प मजबूत और विजन स्पष्ट हो, तो दशकों पुराने किलों को भी ढहाया जा सकता है।

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