
जमशेदपुर : उम्र के 100वें पड़ाव पर पहुंचना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इस उम्र में भी समाज के लिए कुछ कर गुजरने का संकल्प लेना किसी मिसाल से कम नहीं है। जमशेदपुर में जन्मे डॉ. सुरेंद्र प्रसाद ने अपने जीवन के शतक के साथ ऐसा फैसला लिया है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणादायक बन गया है। उन्होंने मृत्यु के बाद अपना शरीर चिकित्सा विज्ञान को दान करने का संकल्प लिया है।
जन्मभूमि जमशेदपुर, कर्मभूमि बनी समाजसेवा
14 सितंबर 1926 को जमशेदपुर में जन्मे डॉ. सुरेंद्र प्रसाद सोमवार को 100 वर्ष की उम्र पूरी करने जा रहे हैं। जीवनभर ज्ञान, संस्कार और सेवा की भावना को आगे बढ़ाने वाले डॉ. प्रसाद ने इस ऐतिहासिक पड़ाव पर देहदान का संकल्प लेकर मानवता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को एक नया आयाम दिया है।
उनका मानना है कि 100 वर्ष की उम्र को जीवन की यात्रा का अंतिम पड़ाव मानने के बजाय इसे मानवता के लिए नई शुरुआत बनाया जा सकता है। इसी सोच के साथ उन्होंने मृत्यु के बाद शरीर चिकित्सा विज्ञान को दान करने का निर्णय लिया है।
‘नश्वर शरीर से किसी की जिंदगी बचे तो इससे बड़ा क्या’
डॉ. सुरेंद्र प्रसाद का संदेश बेहद स्पष्ट है। उनका मानना है कि नश्वर शरीर राख बनने के बजाय यदि मेडिकल विद्यार्थियों के शोध और किसी की जिंदगी बचाने के काम आ सके, तो इससे सार्थक कुछ नहीं हो सकता। यही विचार उन्हें देहदान के लिए प्रेरित करता है।
वे स्वयं देहदान का दृढ़ फैसला ले चुके हैं और दूसरों को भी इस महादान के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उनका यह निर्णय समाज में देहदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
पिता से मिली समाजसेवा की विरासत
डॉ. सुरेंद्र प्रसाद के परिवार में समाजसेवा की परंपरा पुरानी रही है। मूल रूप से मुंगेर (बिहार) के हवेली खड़गपुर निवासी उनके पिता रामेश्वर प्रसाद जमशेदपुर के केशरवानी समाज के प्रथम अध्यक्ष रहे थे। पिता की सामाजिक चेतना को डॉ. सुरेंद्र प्रसाद ने आगे बढ़ाया और परिवार में सबसे बड़े होने के कारण हमेशा मार्गदर्शक की भूमिका निभाई।
टेल्को से सेवानिवृत्ति के बाद वे सोनारी आदर्शनगर में रहे और वर्तमान में रायपुर में परिजनों के साथ रहते हुए भी सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय हैं।
संयमित जीवनशैली को बताया लंबी उम्र का राज
100 वर्ष की उम्र में भी उनकी सक्रियता लोगों को आकर्षित करती है। डॉ. प्रसाद अपनी तंदुरुस्ती का श्रेय संयमित दिनचर्या, खान-पान में कड़े अनुशासन और नियमित जीवनशैली को देते हैं। साहित्य के प्रति भी उनका गहरा अनुराग रहा है। लेखन और प्रकाशन के क्षेत्र में उनका योगदान उल्लेखनीय बताया गया है।
उनका जीवन यह संदेश देता है कि लंबी उम्र केवल वर्षों की गिनती नहीं, बल्कि समाज के लिए किए गए कार्यों और विचारों की निरंतरता का नाम है।
जीवन के सौवें वसंत में दिया अमर संदेश
डॉ. सुरेंद्र प्रसाद का देहदान का संकल्प समाज को मृत्यु के बाद भी सेवा जारी रखने का संदेश देता है। उनका यह फैसला चिकित्सा विज्ञान के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी होने के साथ-साथ समाज में मानव शरीर दान को लेकर जागरूकता पैदा करने वाला है।
जीवन के सौवें वसंत में उनका यह निर्णय सचमुच प्रेरणादायी है। उन्होंने अपने जीवन से समाज को बहुत कुछ दिया और अब मृत्यु के बाद भी चिकित्सा विज्ञान को अपना शरीर देकर मानवता की सेवा जारी रखने का संकल्प लिया है।











