
साफ-सुथरे लोग कितनी गंदगी फैला रहे हैं,
लोग फिर भी बे-वजह उस राह से आ-जा रहे हैं।
भीड़ में आगे खड़े कुछ लोग नंगे हो चुके हैं,
और हम पिछली कतारों में खड़े शर्मा रहे हैं।
कर रहे हैं हम गुजारिश रोटियों की आज उनसे,
वो हमें कानून की बारीकियां समझा रहे हैं।
चुल्लू भर पानी मयस्सर डूबने को है न जिनको,
वो खड़े हमको समंदर का पता बतला रहे हैं।
देश अब खुशहाल है, हर शख्स मालामाल है,
न्याय के गैराज में पैसे जलाए जा रहे हैं।
सैंतालीस में हम गुरु होंगे पूरी कायनात के,
बस इसी जुमले की टोपी सबको वो पहना रहे हैं।
शुभ रात्रि 🪔✍️











