
जमशेदपुर : देश के प्रमुख औद्योगिक घरानों में शामिल टाटा समूह के भीतर चल रहा विवाद अब कानूनी मोड़ पर पहुंच गया है। टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच शेयर बाजार में लिस्टिंग को लेकर जारी मतभेद के बीच टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा और उनके पुत्र नेविल टाटा ने अदालत का रुख किया है। दोनों की ओर से बॉम्बे हाईकोर्ट और मुंबई सिटी सिविल कोर्ट में कैविएट दाखिल की गई है। इसके जरिए अदालत से आग्रह किया गया है कि ट्रस्टियों वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह की ओर से संभावित याचिका पर कोई भी एकतरफा आदेश पारित करने से पहले उनका पक्ष सुना जाए।
शेयर बाजार में लिस्टिंग बना विवाद की मुख्य वजह
टाटा समूह के इस विवाद के केंद्र में टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध कराने का मुद्दा है। टाटा संस में टाटा ट्रस्ट्स की 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। भारतीय रिजर्व बैंक के अपर-लेयर एनबीएफसी नियमों के तहत टाटा संस की लिस्टिंग का मुद्दा महत्वपूर्ण हो गया है।
एक पक्ष लिस्टिंग के पक्ष में है, जबकि नोएल टाटा के नेतृत्व वाले पक्ष की ओर से इस पर असहमति जताई जा रही है। इस मतभेद ने समूह के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया और ट्रस्ट के अधिकारों को लेकर बहस तेज कर दी है।
चैरिटी कमिश्नर में शिकायत के बाद बढ़ा विवाद
इससे पहले महाराष्ट्र के चैरिटी कमिश्नर के समक्ष टाटा ट्रस्ट्स के कामकाज और संचालन में कथित अनियमितताओं को लेकर शिकायत की गई थी। शिकायतकर्ताओं ने ट्रस्ट के प्रशासन और फैसले लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे।
इसी विवाद के बीच नोएल टाटा और नेविल टाटा की ओर से कैविएट दाखिल किए जाने को महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। कैविएट के माध्यम से संबंधित पक्ष यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उसके खिलाफ किसी संभावित याचिका पर सुनवाई किए बिना एकतरफा आदेश न दिया जाए।
17 सितंबर की बोर्ड बैठक में भी सामने आया था मतभेद
टाटा संस के बोर्ड की 17 सितंबर को हुई बैठक में भी लिस्टिंग के मुद्दे पर मतभेद सामने आने की बात रिपोर्ट में कही गई है। बैठक में ट्रस्ट के नामित निदेशक होने के बावजूद वेणु श्रीनिवासन ने टाटा संस प्रबंधन के पक्ष में वोट दिया था। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच मतभेद और गहरे होने की चर्चा तेज हुई।
अब कैविएट दाखिल होने के बाद यह विवाद कॉरपोरेट प्रशासन से आगे बढ़कर कानूनी प्रक्रिया के दायरे में पहुंच गया है।
क्या होती है कैविएट?
कैविएट अदालत में दाखिल की जाने वाली एक कानूनी सूचना है। इसके जरिए कोई पक्ष अदालत से अनुरोध करता है कि संबंधित मामले में उसके खिलाफ कोई आदेश पारित करने से पहले उसे सुनवाई का अवसर दिया जाए।
इसका उद्देश्य संभावित एकतरफा आदेश से बचना और अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखने का अवसर सुनिश्चित करना है। हालांकि, कैविएट दाखिल होने का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित पक्ष को मामले में स्वतः जीत मिल गई है या अदालत ने उसके पक्ष में कोई फैसला सुना दिया है।
टाटा समूह के लिए क्यों अहम है यह विवाद?
टाटा समूह की कंपनियों और टाटा ट्रस्ट्स के बीच संबंध समूह के प्रशासनिक ढांचे के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। टाटा संस की लिस्टिंग का मुद्दा केवल शेयर बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे समूह के स्वामित्व, नियंत्रण और भविष्य की रणनीति से जुड़े सवाल भी जुड़े हैं।
ऐसे में अदालत में दाखिल कैविएट और संभावित कानूनी कार्यवाही पर कारोबारी जगत की नजर रहेगी। मामले में आगे क्या रुख अपनाया जाता है, इससे टाटा समूह के भीतर जारी विवाद की दिशा स्पष्ट हो सकती है।











