
नीमडीह : झारखंड के इतिहास में 21 अक्टूबर 1982 की तारीख एक ऐसे दर्दनाक अध्याय के रूप में दर्ज है, जिसे याद कर आज भी लोगों की आंखें नम हो जाती हैं। तत्कालीन सिंहभूम जिले के ईचागढ़ प्रखंड के तिरुलडीह में पुलिस फायरिंग के दौरान दो युवा छात्रों की मौत हो गई थी। दोनों छात्र सूखे से राहत, किसानों की समस्याओं के समाधान और क्षेत्र को अकालग्रस्त घोषित करने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे थे।
21 अक्टूबर 2026 को इस घटना के 44 वर्ष पूरे हो गए। चार दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह गोलीकांड शहादत, सरकारी जवाबदेही और न्याय की अधूरी उम्मीदों को लेकर चर्चा में है।
भूख, सूखा और बदहाली से जूझ रहा था पूरा इलाका
वर्ष 1982 में तिरुलडीह, चांडिल और नीमडीह समेत आसपास के क्षेत्रों में सूखे की गंभीर स्थिति थी। खेतों में धान की फसल नहीं उग पाई थी। किसान दाने-दाने को मोहताज थे और ग्रामीण परिवारों के सामने भोजन का संकट खड़ा हो गया था।
विस्थापन, गरीबी, अभाव और भुखमरी से परेशान लोगों में शासन-प्रशासन के प्रति नाराजगी बढ़ रही थी। इसी पृष्ठभूमि में छात्रों और युवाओं ने क्षेत्र की समस्याओं को लेकर आवाज उठानी शुरू की।
अकालग्रस्त घोषित करने समेत कई मांगों को लेकर आंदोलन
क्रांतिकारी छात्र युवा मोर्चा के बैनर तले छात्र और युवा सड़कों पर उतरे थे। उनकी प्रमुख मांग थी कि चांडिल, नीमडीह और ईचागढ़ क्षेत्र को तत्काल अकालग्रस्त घोषित किया जाए। इसके साथ ही जनता की दूसरी बुनियादी समस्याओं के समाधान की मांग भी उठाई जा रही थी।
बताया जाता है कि आंदोलन की शुरुआत शांतिपूर्ण प्रदर्शन से हुई थी। बाद में प्रदर्शनकारी तत्कालीन ईचागढ़ प्रखंड मुख्यालय तिरुलडीह स्थित अंचल कार्यालय पहुंचे।
अंचल कार्यालय में वार्ता के दौरान चलीं गोलियां
21 अक्टूबर 1982 को छात्र-युवाओं का जत्था अपनी मांगों को लेकर तिरुलडीह पहुंचा था। सभा के बाद प्रतिनिधिमंडल अंचल अधिकारी को ज्ञापन सौंपने और लिखित आश्वासन लेने के लिए कार्यालय के भीतर गया था।
इसी दौरान बाहर प्रदर्शन कर रहे छात्रों और पुलिस के बीच तनाव बढ़ गया। आरोप है कि बिना किसी ठोस चेतावनी के पुलिस ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी।
इस गोलीकांड में चांडिल के छात्र अजीत महतो और ईचागढ़ थाना क्षेत्र के आदरडीह गांव निवासी धनंजय महतो की मौत हो गई। घटना में कई अन्य छात्र गंभीर रूप से घायल भी हुए थे।
दो युवाओं की शहादत ने आंदोलन को दी नई धार
तिरुलडीह की घटना केवल दो छात्रों की मौत तक सीमित नहीं रही। इसने झारखंड आंदोलन को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जल, जंगल, जमीन और अलग राज्य की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन में इस घटना के बाद और तेजी आई।
झारखंड मुक्ति मोर्चा समेत विभिन्न संगठनों ने घटना का विरोध किया। आंदोलन से जुड़े नेताओं ने तिरुलडीह पहुंचकर विरोध दर्ज कराया। शहीदों के शवों को उनके पैतृक गांवों तक पहुंचाने और आंदोलन को संगठित करने में भी क्षेत्रीय नेताओं की भूमिका रही।
शहीद परिवारों की उम्मीदें आज भी अधूरी
गोलीकांड के समय धनंजय महतो के पुत्र उपेन महतो की उम्र महज कुछ महीने बताई जाती है। पिता की शहादत के बाद परिवार ने वर्षों तक सरकारी सहायता और सम्मान की उम्मीद लगाए रखी।
हर साल शहादत दिवस पर श्रद्धांजलि दी जाती है। राजनीतिक मंचों से बड़े-बड़े वादे भी होते हैं, लेकिन शहीद परिवारों की शिकायतों और अपेक्षाओं पर ठोस कार्रवाई का सवाल आज भी महत्वपूर्ण बना हुआ है।
दोनों छात्रों को आधिकारिक रूप से शहीद का दर्जा दिए जाने और उनके परिजनों को समुचित सरकारी सहायता मिलने की मांग लंबे समय से उठती रही है।
44 साल बाद भी जांच और जवाबदेही पर सवाल
तिरुलडीह गोलीकांड की बरसी पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस घटना के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही कितनी तय हुई? घटना के बाद जांच समितियों के गठन की बात सामने आई थी, लेकिन उपलब्ध विवरण के अनुसार जांच के निष्कर्ष और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई को लेकर स्पष्ट सार्वजनिक जानकारी नहीं मिलती।
झारखंड अलग राज्य बनने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि इतिहास के इस अध्याय की समीक्षा होगी और शहीद परिवारों को न्याय मिलेगा। लेकिन आज भी यह मामला शहादत की यादों और न्याय की उम्मीदों के बीच खड़ा दिखाई देता है।
सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं, जवाब भी जरूरी
21 अक्टूबर केवल दो युवाओं को याद करने का दिन नहीं है। यह उस दौर की याद दिलाता है, जब सूखे, भुखमरी और सरकारी उपेक्षा के खिलाफ आवाज उठाने वाले छात्रों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी।
तिरुलडीह गोलीकांड के 44 वर्ष पूरे होने पर शहीद अजीत महतो और धनंजय महतो की शहादत एक बार फिर इतिहास के उन सवालों को सामने लाती है, जिनके जवाब आज भी तलाशे जा रहे हैं।
शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि तभी सार्थक होगी, जब उनके योगदान को उचित सम्मान मिले, परिवारों की लंबित मांगों पर कार्रवाई हो और घटना से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों तथा जवाबदेही की स्थिति स्पष्ट रूप से सार्वजनिक की जाए।












