Spread the love

 

र्मेंद्र कुमार, नई दिल्ली

80वें स्वाधीनता दिवस के पावन अवसर पर लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का देश के नाम संबोधन कई मायनों में अभूतपूर्व रहा। उन्होंने एक तरफ जहां ‘विकसित भारत 2047’ के संकल्प को दोहराया, वहीं दूसरी तरफ देश के आंतरिक परिदृश्य पर बात करते हुए एक नई शब्दावली ‘दिमागी नक्सल’ (इंटेलेक्चुअल नक्सल) का प्रयोग कर एक नई वैचारिक बहस को जन्म दे दिया है। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि देश ने जंगलों में हथियारों के बल पर लड़ने वाले नक्सलियों का तो लगभग खात्मा कर दिया है, लेकिन अब सत्ता के गलियारों और वैचारिक मंचों पर सक्रिय ‘दिमागी नक्सलियों’ को पहचान कर अलग-थलग करने की जरूरत है।
यह शब्दावली सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मतभेदों को एक बार फिर सतह पर ले आई है। सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर ‘दिमागी नक्सल’ की सटीक परिभाषा क्या है? क्या वे लोग दिमागी नक्सल हैं जो सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हैं और जनहित में आवाज बुलंद करते हैं? या फिर वे जो सोशल मीडिया के दौर में प्रोपेगैंडा का जवाब उसी की भाषा में तार्किकता से देते हैं? लोकतांत्रिक ताने-बाने में इस तरह के शब्दों का प्रयोग गहरे चिंतन और गंभीर चिंता का विषय बन जाता है।
एक मजबूत लोकतंत्र की सबसे बड़ी पहचान उसकी सहनशीलता और आलोचना को स्वीकार करने की क्षमता में निहित होती है। जब देश की सर्वोच्च प्राचीर से वैचारिक विरोधियों या आलोचकों के लिए ‘नक्सल’ जैसी उग्र उपमाओं का प्रयोग किया जाता है, तो यह संदेश जाता है कि सरकार असहमति के स्वरों को भी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे के रूप में देख रही है। विपक्ष का आरोप है कि यह सत्ता की आलोचना करने वाले बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं और जागरूक नागरिकों को चुप कराने या उन्हें लांछित करने का एक नया राजनीतिक हथकंडा है।
यदि जनहित में सवाल पूछने वाले, नीतियों की खामियां उजागर करने वाले और जनता को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने वाले लोगों को ‘दिमागी नक्सल’ की श्रेणी में रख दिया जाएगा, तो इससे समाज में भय और अविश्वास का माहौल पैदा होगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता को जागरूक करना किसी भी जीवंत समाज का दायित्व है, न कि किसी साजिश का हिस्सा। सरकार की नीतियां चाहे कितनी भी लोक-कल्याणकारी क्यों न हों, वे कमियों से परे नहीं हो सकतीं। उन कमियों पर उंगली उठाना देशद्रोह या नक्सली मानसिकता नहीं, बल्कि एक सजग नागरिक का परम कर्तव्य है।
प्रधानमंत्री का यह वक्तव्य उनकी सरकार की एक प्रकार की असहजता के साथ उनकी तानाशाही मानसिकता को भी दर्शाता है। यह चिंता का विषय है कि क्या एक पूर्ण बहुमत और स्थिर जनादेश वाली सरकार इतनी कमजोर या असंवेदनशील हो गई है कि वह रचनात्मक आलोचना सुनने का साहस भी नहीं जुटा पा रही है? यदि आलोचना के हर स्वर को ‘नक्सलवाद’ या ‘विदेशी साजिश’ से जोड़कर देखा जाने लगेगा, तो यह देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं।
लालकिले का मंच पूरे देश को जोड़ने और राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने का माध्यम होना चाहिए। ऐसे गरिमामयी मंच से विभाजनकारी शब्दावलियों के प्रयोग से बचा जाना चाहिए था। ‘शक्ति की सप्तधारा’ और ‘युवा शक्ति’ के जरिए देश को आगे ले जाने की जो सकारात्मक बातें इस भाषण में थीं, वे इस एक विवादित टिप्पणी के कारण हाशिए पर चली गईं।
एक महान राष्ट्र का निर्माण केवल आधारभूत संरचना या आर्थिक आंकड़ों से नहीं होता, बल्कि विचारों की स्वतंत्रता और विविध दृष्टिकोणों के सम्मान से होता है। सरकार को चाहिए कि वह आलोचना से डरने या उसे दबाने के बजाय, उसे एक सुधार के अवसर के रूप में देखे। असहमति के सुरों को ‘दिमागी नक्सल’ कहकर खारिज करने की प्रवृत्ति पर पुनर्विचार करना होगा, क्योंकि संवादहीनता और असहनशीलता अंततः समाज को कमजोर ही करती हैं।

error: Content is protected !!
Exit mobile version