
- मेडिकल जांच में स्पर्म नहीं मिलने के बावजूद पीड़िता की गवाही को हाईकोर्ट ने माना विश्वसनीय, तीन दोषियों को दो महीने के अंदर आत्मसमर्पण करने का निर्देश
जमशेदपुर/रांची : पूर्वी सिंहभूम के पटमदा थाना क्षेत्र से जुड़े चर्चित सामूहिक दुष्कर्म मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने चारों दोषियों को राहत देने से इनकार कर दिया है। जस्टिस आनंद सेन और जस्टिस पीके श्रीवास्तव की खंडपीठ ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए चारों दोषियों की अपील खारिज कर दी। अदालत ने उन्हें दी गई 20-20 साल के कठोर कारावास और 40-40 हजार रुपये जुर्माने की सजा को सही ठहराया है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि केवल मेडिकल जांच में स्पर्म नहीं मिलने या चिकित्सीय रिपोर्ट में कमियों के आधार पर पीड़िता की विश्वसनीय गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता। अदालत ने पीड़िता के बयान को भरोसेमंद माना। साथ ही, उसके शरीर और पीठ पर मिले चोट व खरोंच के निशानों को भी घटना की पुष्टि करने वाले महत्वपूर्ण साक्ष्यों के रूप में देखा।
तीन दोषियों को दो महीने में सरेंडर करने का आदेश
हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता हेमंत सिंह को जेल में ही रहने का निर्देश दिया है। वहीं, अन्य तीन दोषियों रामनाथ सिंह, विभीषण सिंह और फागु हांसदा को दो महीने के अंदर अदालत में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया है। इस फैसले के साथ ही निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को बरकरार रखने का रास्ता साफ हो गया है।
2013 में जंगल के पास हुई थी घटना
यह मामला पांच नवंबर 2013 का है। प्राथमिकी के अनुसार, पीड़िता अपनी ससुराल से मायके जा रही थी। दोपहर करीब तीन बजे जब वह पटमदा थाना क्षेत्र में एक जंगल के पास पहुंची, तभी जेरका गांव के निवासी हेमंत सिंह, रामनाथ सिंह, विभीषण सिंह और फागु हांसदा ने उसे कथित तौर पर जबरन पकड़ लिया। इसके बाद आरोपी उसे खींचकर जंगल में ले गए और सामूहिक दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया। घटना के बाद सभी आरोपी मौके से फरार हो गए।
पंचायत में सुलझाने की हुई थी कोशिश
घटना के बाद स्थानीय स्तर पर पंचायत बैठाकर मामले को सुलझाने का प्रयास किया गया था। हालांकि, आरोपियों के भाग जाने के कारण बात नहीं बन सकी। इसके बाद घटना के तीन दिन बाद, आठ नवंबर 2013 को पटमदा थाना में प्राथमिकी दर्ज कराई गई। पुलिस ने मामले की जांच की और आरोपियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ी।
2018 में फास्ट ट्रैक कोर्ट ने सुनाई थी सजा
इस मामले में जमशेदपुर की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 23 अगस्त 2018 को चारों आरोपियों को दोषी करार दिया था। इसके बाद 29 अगस्त 2018 को अदालत ने प्रत्येक दोषी को 20 साल के कठोर कारावास और 40-40 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। दोषियों ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अब हाईकोर्ट ने उनकी अपील खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है।
पीड़िता की गवाही को माना अहम
इस फैसले का महत्वपूर्ण पहलू पीड़िता की गवाही और मेडिकल साक्ष्यों को लेकर अदालत की टिप्पणी है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मेडिकल रिपोर्ट में किसी विशेष साक्ष्य का नहीं मिलना अपने आप में पीड़िता के बयान को अविश्वसनीय ठहराने का आधार नहीं बन सकता। मामले में पीड़िता की गवाही और उसके शरीर पर मिले चोट व खरोंच के निशानों को महत्वपूर्ण माना गया।
हाईकोर्ट के फैसले के बाद चारों दोषियों को निचली अदालत से मिली 20-20 साल की सजा बरकरार रहेगी। वहीं, तीन दोषियों को दो महीने के अंदर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया है।












