
जमशेदपुर : दुर्गापूजा के अवसर पर शहर के अलग-अलग पूजा पंडालों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। वहीं, साकची के चेनाब रोड स्थित दुर्गा एवं कालीबाड़ी की दुर्गापूजा अपनी ऐतिहासिक परंपरा और धार्मिक आस्था के लिए खास पहचान रखती है। यहां इस वर्ष 104वें वर्ष में मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की जा रही है। वर्ष 1923 से शुरू हुई यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाई जा रही है।
1923 में हुई थी पूजा की शुरुआत
साकची की इस दुर्गाबाड़ी में दुर्गापूजा का इतिहास सौ साल से भी अधिक पुराना है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 1923 में कालीमाटी मैदान में वर्तमान बंगाल क्लब के सामने पूजा की शुरुआत हुई थी। बाद में टाटा स्टील की ओर से चेनाब रोड में पूजा के लिए जमीन उपलब्ध कराई गई। इसके बाद यहां नियमित रूप से दुर्गापूजा का आयोजन होने लगा। समय के साथ यह स्थान श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया।
परंपरागत डाकेर साज में तैयार हुई मां की प्रतिमा
इस वर्ष मां दुर्गा की प्रतिमा पारंपरिक डाकेर साज में तैयार की गई है। पूजा का आयोजन विशुद्ध सिद्धांत पंचांग के अनुसार किया जा रहा है। महाअष्टमी पर मां को पुष्पांजलि अर्पित करने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है। वहीं, महानवमी पर विशेष पूजा के साथ यज्ञ-हवन का आयोजन किया जाएगा।
विद्युत सज्जा से जगमगा रहा मंदिर परिसर
दुर्गाबाड़ी मंदिर परिसर को आकर्षक विद्युत सज्जा से सजाया गया है। पूजा के दौरान प्रतिदिन श्रद्धालुओं के बीच महाप्रसाद का वितरण किया जा रहा है। पूजा समिति की ओर से धार्मिक अनुष्ठानों को परंपरागत तरीके से संपन्न कराया जा रहा है। आयोजन को लेकर समिति के सदस्य सक्रिय हैं और श्रद्धालुओं की सुविधा का ध्यान रखा जा रहा है।
आस्था और परंपरा का प्रतीक बनी दुर्गाबाड़ी
मंदिर समिति के महासचिव शांतनु बोस के अनुसार, पूजा की परंपराओं का पूरी श्रद्धा के साथ निर्वहन किया जा रहा है। विशुद्ध सिद्धांत पंचांग के अनुसार पूजा होने के कारण यहां महाअष्टमी की पुष्पांजलि का विशेष धार्मिक महत्व है। हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां दुर्गा के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।
पूजा के सफल आयोजन में समिति के अध्यक्ष अशोक कुमार भट्टाचार्य, महासचिव शांतनु बोस, ट्रस्टी असीम कुमार कर, ईश्वरचंद्र प्रमाणिक, प्रबाल क्रांति सरकार, सुनील चटर्जी, संयुक्त सचिव विश्वजीत बनर्जी, शांतनु हाजरा, सुब्रत विश्वास और कालाचांद कुइला सहित अन्य सदस्य सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
104 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा साकची की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हर साल दुर्गापूजा के दौरान यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है और मां दुर्गा के प्रति लोगों की आस्था देखने को मिलती है।












