
धनबाद : चर्चित रंजय सिंह हत्याकांड में करीब नौ वर्षों तक चली न्यायिक प्रक्रिया के बाद धनबाद की अदालत ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जिला एवं सत्र न्यायाधीश दुर्गेश चंद्र अवस्थी की अदालत ने मामले में आरोपी हर्ष सिंह और नंदकिशोर सिंह उर्फ मामा को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। अदालत के इस निर्णय को लंबे समय से लंबित मामले में बड़ा कानूनी मोड़ माना जा रहा है।
अभियोजन आरोप साबित करने में रहा असफल
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अदालत में पेश किए गए साक्ष्य और गवाहियों के आधार पर दोनों आरोपियों के विरुद्ध लगाए गए आरोप संदेह से परे प्रमाणित नहीं हो सके। इसी आधार पर अदालत ने हर्ष सिंह और नंदकिशोर सिंह उर्फ मामा को बरी करने का आदेश दिया। बचाव पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता समर श्रीवास्तव, आयुष श्रीवास्तव और सिद्धार्थ शर्मा ने अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखा। बचाव पक्ष का तर्क था कि अभियोजन की ओर से प्रस्तुत साक्ष्य आरोपों को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय नहीं हैं।
2017 में हुई थी रंजय सिंह की हत्या
धनबाद के तत्कालीन मेयर संजीव सिंह के करीबी माने जाने वाले रंजय सिंह उर्फ राजीव रंजन सिंह की 29 जनवरी 2017 को हत्या कर दी गई थी। यह घटना बिग बाजार के सामने चाणक्य नगर मोड़ के पास हुई थी। वारदात के समय रंजय अपने परिचित के साथ मौजूद थे। घटना के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। अगले दिन अज्ञात हमलावरों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने अलग-अलग पहलुओं से जांच शुरू की और संदिग्धों की पहचान के प्रयास किए।
पहचान और साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़ी जांच
पुलिस जांच के दौरान गवाहों के बयान, पहचान संबंधी प्रक्रिया और अन्य उपलब्ध तथ्यों के आधार पर आरोपियों के नाम सामने आए। इसके बाद आरोपपत्र दाखिल कर न्यायालय में सुनवाई शुरू हुई। मामले में कई वर्षों तक गवाहों के बयान दर्ज किए गए और दोनों पक्षों ने अपने-अपने साक्ष्य तथा तर्क अदालत के सामने रखे। हालांकि लंबी सुनवाई के बाद अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि आरोपियों के विरुद्ध प्रस्तुत सामग्री दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं है। फलस्वरूप दोनों को संदेह का लाभ देते हुए आरोपों से बरी कर दिया गया।
फैसले के बाद फिर चर्चा में आया मामला
धनबाद की राजनीति और आपराधिक घटनाक्रम से जुड़ा यह मामला लंबे समय से चर्चा में रहा है। अदालत का वर्तमान फैसला आपराधिक मुकदमों में ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के महत्व को रेखांकित करता है। हालांकि बरी किए जाने का अर्थ यह है कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोप न्यायालय में साबित नहीं हो सके।











