
- बचपन में खोया मां का साया, परिवार की आर्थिक तंगी के कारण किया कुली और कारपेंटर का काम; मेहनत, संघर्ष और अभिनय के दम पर हासिल किया सुपरस्टार का मुकाम
नई दिल्ली : भारतीय सिनेमा में कुछ सितारे अपनी अदाकारी से पहचान बनाते हैं, तो कुछ ऐसे भी होते हैं, जिनकी लोकप्रियता लोगों के दिलों में एक अलग जगह बना लेती है। सुपरस्टार रजनीकांत ऐसी ही शख्सियत हैं। दक्षिण भारत में उन्हें ‘थलाइवा’ के नाम से जाना जाता है। आज उनकी एक झलक पाने के लिए प्रशंसक बेताब रहते हैं, लेकिन एक समय ऐसा भी था, जब परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्हें मजदूरी करनी पड़ी थी। बस कंडक्टर की नौकरी से फिल्मी दुनिया के महानायक बनने तक का उनका सफर संघर्ष, मेहनत और आत्मविश्वास की मिसाल है।
बचपन में छूट गया मां का साथ
रजनीकांत का जन्म 12 दिसंबर 1950 को बेंगलुरु में एक साधारण मराठी परिवार में हुआ था। उनका असली नाम शिवाजी राव गायकवाड़ है। उनके पिता पुलिस कांस्टेबल थे। सीमित आमदनी में परिवार का गुजारा करना आसान नहीं था। बचपन में ही मां का निधन हो जाने से उनके जीवन में मुश्किलों का दौर शुरू हो गया। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि उन्हें कम उम्र में ही काम करना पड़ा।
कभी कुली तो कभी कारपेंटर का काम
परिवार की जिम्मेदारियों के बीच रजनीकांत ने कुली और कारपेंटर जैसे काम किए। बाद में उन्हें बेंगलुरु ट्रांसपोर्ट सर्विस में बस कंडक्टर की नौकरी मिली। बस में टिकट काटने और यात्रियों से संवाद करने के दौरान भी उनका अंदाज अलग था। अभिनय के प्रति उनका झुकाव लगातार बढ़ रहा था। नौकरी करते हुए उन्होंने अपने भीतर छिपे कलाकार को पहचाना और फिल्मी दुनिया में किस्मत आजमाने का फैसला किया।
दोस्तों की मदद से पहुंचे चेन्नई
अभिनेता बनने का सपना लेकर रजनीकांत चेन्नई पहुंचे और मद्रास फिल्म इंस्टीट्यूट में अभिनय का प्रशिक्षण लिया। उस समय उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं थे। ऐसे में दोस्तों की मदद ने उन्हें आगे बढ़ने का रास्ता दिया। वर्ष 1975 में निर्देशक के. बालाचंदर की नजर उनकी प्रतिभा पर पड़ी। उन्होंने रजनीकांत को तमिल फिल्म ‘अपूर्व रागांगल’ में मौका दिया। बालाचंदर ने ही उन्हें रजनीकांत नाम दिया। हालांकि, शुरुआती दौर में उन्हें मुख्य भूमिकाओं के बजाय सहायक भूमिकाएं मिलीं।
‘बिल्ला’ से बदली पहचान
फिल्मों में लगातार काम करने के बावजूद सफलता की राह आसान नहीं रही। लगातार काम के दबाव और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों ने भी उन्हें प्रभावित किया। एक समय ऐसा आया, जब उन्होंने फिल्मों से दूरी बनाने के बारे में सोचा। लेकिन उन्होंने वापसी की और अपने अभिनय से दर्शकों का दिल जीतना जारी रखा। वर्ष 1980 में आई तमिल फिल्म ‘बिल्ला’ ने उनके करियर को नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके बाद उनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई।
फ्लॉप फिल्म से भी लगा आर्थिक झटका
सफलता मिलने के बाद भी रजनीकांत को आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा। उन्होंने अपने प्रोडक्शन हाउस के माध्यम से फिल्म ‘बाबा’ बनाई, लेकिन फिल्म को उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली। इससे उन्हें आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। यह दौर उनके लिए एक और चुनौती लेकर आया। हालांकि, असफलता के बावजूद उन्होंने अपने करियर को आगे बढ़ाया और दर्शकों के बीच अपनी लोकप्रियता बनाए रखी।
करोड़ों प्रशंसक, प्रतिष्ठित पुरस्कार
रजनीकांत ने अपने लंबे फिल्मी करियर में 170 से अधिक फिल्मों में काम किया है। उनकी शैली, संवाद अदायगी और पर्दे पर मौजूदगी ने उन्हें एक अलग पहचान दी। उनके प्रशंसकों की दीवानगी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुछ प्रशंसकों ने उनके सम्मान में मंदिर तक बनवाए। भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्म भूषण, पद्म विभूषण और दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।
संघर्ष से सफलता तक का सफर
रजनीकांत की कहानी केवल एक अभिनेता के सुपरस्टार बनने की कहानी नहीं है। यह उस व्यक्ति का सफर है, जिसने सीमित संसाधनों, शुरुआती असफलताओं और कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने सपने को नहीं छोड़ा। बस कंडक्टर से भारतीय सिनेमा के चर्चित सितारे तक पहुंचे रजनीकांत आज भी लाखों लोगों के लिए प्रेरणा हैं। उनका सफर बताता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, लगातार मेहनत और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण से नई राह बनाई जा सकती है।












