
सोनम वांगचुक शिक्षाविद और अभियंता हैं, जो दिल्ली स्थित जंतर मंतर पर उपवास पर बैठे थे। खबर लिखने से 10 घंटा पहले यानी 18 जुलाई की अलसुबह, दिल्ली पुलिस ने उनकी सेहत का हवाला देकर उन्हें सफदरजंग अस्पताल में जबरन भर्ती करा दिया,जहां पर उनका इलाज चल रहा है। आंदोलन से जुड़े लोगों का आरोप है कि पुलिस ने किसी अदृश्य शक्ति के आदेश का पालन करते हुए यह क्रांतिकारी कदम उस समय उठाया, जब पूरा देश चादर ओढ़ कर सो रहा था। सोनम वांगचुक के उपवास करने के पीछे उनकी दो प्रमुख मांगे हैं- पहली मांग है-“केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को हटाया जाए”, और दूसरी मांग है – “देश में नौकरी एवं दाखिला के लिए होने वाली परीक्षाएं पारदर्शी तरीके से संपन्न हों?”सर्वविदित है कि इन परीक्षाओं में देश के नौनिहाल भाग लेते हैं, जो देश के भविष्य और मानव ऊर्जा के मुख्य आधार हैं। मैं व्यक्तिगत रूप से सोनम वांगचुक की पहली मांग पर विश्वास नहीं रखता, क्योंकि एक धर्मेंद्र प्रधान को हटा भी दिया जाएगा तो दूसरे प्रधान जी आ जाएंगे और फिर वही धंधा शुरू हो जाएगा! वांगचुक की दूसरी मांग काबिल-ए-गौर है, जिस पर देश का भविष्य टिका है और साथ ही प्रजातंत्र की विश्वसनीयता भी। वैसे तो आजादी के साथ ही सरकारों के द्वारा संचालित होने वाली परीक्षाओं में धांधली का अंकुरण हो गया था, लेकिन वर्तमान समय में स्थिति काफी विस्फोटक हो गई है। दूसरी तरफ राज्य सरकारों के द्वारा नौकरी एवं दाखिले के लिए आयोजित होने वाली परीक्षाओं तथा परीक्षाफल का हाल तो और भी बदतर हो चुका है। खुला खेल फर्रुखाबादी चल रहा है।
हालिया दिनों केंद्र सरकार द्वारा आयोजित परीक्षा के प्रश्न- पत्र वायु सेना के विमानों से उन शहरों तक पहुंचाए गए जहां परीक्षा केंद्र बनाए गए थे। अमूमन ऐसा तब होता है जब देश में कोई आपदा- विपदा हो, अथवा सत्ता- “कानून- व्यवस्था संभालने में असमर्थ और असफल हो!” बहरहाल, पुनः जंतर मंतर पर धरना देने वाले सोनम वांगचुक के उपवास और धरने की कहानी की ओर लौटते हैं, और उनकी मुख्य मांग का विश्लेषण करते हैं। देश में हर साल केंद्र सरकार के द्वारा इंजीनियर, डॉक्टर, यूपीएससी, एसएससी सहित तमाम परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं। इसी तरह राज्य सरकारों के द्वारा भी क्लास 2,3 और 4th क्लास की नौकरी के लिए परीक्षाएं आयोजित होती हैं। इन परीक्षाओं में भाग लेने वाले करोड़ों बच्चों में अधिकांश, निम्न मध्यवर्गीय और गरीबी- गुरबत में जीने वाले परिवारों से आते हैं। परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने की लालसा, बच्चों की तैयारी, उत्साह और उनकी सफलता के प्रति आशान्वित उनके अभिभावकों की उम्मीद का सारा दारोमदार उस परीक्षाफल पर निर्भर होता है, जिसमें उनके बच्चों के स्वर्णिम भविष्य का सपना छुपा होता है। लेकिन अफसोस इस बात का है कि परीक्षाएं संपन्न होने के बाद बार-बार प्रश्न- पत्र लीक होने और परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों के संदेहास्पद कार्यप्रणाली पर आरोप लगने के बावजूद सरकार के द्वारा पारदर्शी तरीके से परीक्षा संपन्न कराने के लिए ठोस एवं उचित कदम नहीं उठाया जा रहा है। एक तरफ अभिभावक अपने बच्चों के भविष्य के लिए खेत- खलिहान बेच देते हैं, माएं गहने बेच देती हैं, बच्चे परीक्षाओं में पास होने के लिए दिन-रात हाड़- तोड़ मेहनत करते हैं, और दूसरी तरफ व्यवस्था! प्रश्न पत्र लीक करवा देती है? हर परीक्षा के बाद बच्चों को आंदोलन करना पड़ रहा है! लगता है देश में परीक्षा की नई तकनीक ईजाद हो गई है। पहले परीक्षा की तैयारी, फिर परीक्षा, तत्पश्चात प्रश्न- पत्र लीक होने की खबर, पुनः परीक्षा कराने के लिए आंदोलन, तब जाकर परीक्षाफल घोषित हो रहा है। ऐसी स्थिति में परीक्षार्थियों के मन में नैराश्य का भाव पैदा होने तथा अवसाद में जाने का खतरा बढ़ जाता है। हमारा आदर्श वाक्य है, ‘युवा शक्ति राष्ट्र शक्ति”होती है। लेकिन सवाल है कि क्या हम युवाओं को सही दिशा दे पा रहे हैं?’उन्हें मानसिक रूप से बीमार और दिशाहीन बनाकर हम विकसित राष्ट्र का सपना पूरा नहीं कर सकते? आज यह राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है, जिसे लटकाने-भटकाने की नहीं अपितु समझने की जरूरत है। इतिहास गवाह है -ऐसे ही मुद्दों के गर्भ से आंदोलन पैदा होते हैं।बदमली का आलम यह है कि इस देश में होने वाली हर जांच और परीक्षा संदेह के घेरे में है। ऐसा इसलिए है कि सरकारों की कार्यशैली साक्षात संदेह के घेरे में है। देश में एक तरफ करोड़ों युवा बेरोजगार घूम रहे हैं, इंसाफ के लिए दर-बदर हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ न्याय के गैराज में करोड़ों रुपए की राष्ट्रीय मुद्रा जलाई जा रही है। मीर कासिम और गजनवी के भूत पुनः सक्रिय हो गए हैं। देवालयों की तिजोरियों पर आफत बरपा हो रही है। कानून- व्यवस्था संभालने वालों का आलम यह है कि अपराध जैसा भी हो, 80% फैसला थानों में ही हो जा रहा है। व्यवस्था के कथनानुसार देश में नक्सली उन्मूलन हो चुका है और लेवी बंद हो गई है। लेकिन सवाल है कि व्यवस्था के कार्यालयों में हर फाइल को निपटाने के लिए जिस तरह हरामखोरी का धंधा चल रहा है, वो लेवी कैसे रुकेगी? बहरहाल इस सब के बावजूद लोगों को आज भी व्यवस्था से उम्मीद और न्यायालय पर भरोसा बरकरार है। इसीलिए सोनम वांगचुक गांधीवादी तरीके से देश में नौकरी एवं दाखिले के लिए होने वाली परीक्षाओं को पारदर्शी तरीके से कराने के लिए सरकार पर दबाव बना रहे हैं। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि देश के युवाओं के उज्जवल भविष्य के लिए सोनम वांगचुक द्वारा किए जा रहे उपवास और धरने की आहट को व्यवस्था अवश्य महसूस करेगी।
शीशे के मीनार हैं, पत्थर के दीवार हैं,
गर मीनार झुकते हैं हवा के झोंकों से, तो पत्थर ही गुनहगार हैं।
——– संपादक की कलम से –
