
धर्मेंद्र कुमार, अक्षर संवाद
पटना की हाई-प्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव का मतदान संपन्न हो चुका है। पारंपरिक रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का अभेद्य गढ़ माने जाने वाले इस शहरी क्षेत्र का चुनावी समर इस बार महज एक सीट जीतने की होड़ नहीं है। यह बिहार की आगामी राजनीतिक दिशा, नए विकल्पों की स्वीकार्यता और पारंपरिक वोटबैंक की एकजुटता का एक बड़ा लिटमस टेस्ट बन गया है। यहां यह देखना लाजमी होगा कि देशभर में आंदोलनरत युवाओं का रुख इस उपचुनाव में किस ओर है। क्या युवाओं ने भाजपा के विरुद्ध अपना विरोध प्रकट किया है या लोगों ने एक बार फिर भाजपा के प्रति अपना विश्वास व्यक्त किया है।
कम मतदान से बनी असमंजस की स्थिति
बांकीपुर उपचुनाव में सबसे पहला और चिंताजनक पहलू मतदान का बेहद कम प्रतिशत रहा। आंकड़ों के मुताबिक, इस बार करीब 34.39 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया है, जो 2025 के आम चुनाव (41.35%) से भी लगभग 7.23 फीसदी कम है। देश और राज्य की राजनीति पर तीखी बहस करने वाला पटना का प्रबुद्ध और शहरी मतदाता पोलिंग बूथ तक पहुंचने में एक बार फिर नाकाम रहा। सोशल मीडिया और बैठकों में बड़े बदलाव की बातें करने वाले मतदाताओं की यह उदासीनता दर्शाती है कि चुनाव को लेकर एक बड़ा वर्ग अभी भी गंभीर नहीं है। जानकारों के अनुसार कम मतदान का यह ढर्रा सीधे तौर पर कैडर-आधारित पार्टियों को फायदा पहुंचाता है, जो अपने वोटरों को बूथ तक लाने की संगठनात्मक क्षमता रखती हैं। ऐसे में भाजपा का पलड़ा भारी दिख रहा है लेकिन वहीं कुछ विद्वानों का मानना है कि सरकार से नाराजगी के कारण भी मतदान कम हुआ है।
क्या जन सुराज बनेगा तीसरा ध्रुव?
इस उपचुनाव को राष्ट्रीय स्तर पर जिसने सबसे ज्यादा सुर्खियों में लाया, वह है जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर का खुद चुनावी मैदान में उतरना। आम तौर पर रणनीतिकार की भूमिका में रहने वाले प्रशांत किशोर ने खुद चुनावी मैदान में उतरकर एक बहुत बड़ा सियासी जोखिम लिया है। यदि वे भाजपा के इस पारंपरिक गढ़ में सेंध लगाने में कामयाब होते हैं, तो यह बिहार की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत होगी और ‘जन सुराज’ राज्य में एक मजबूत तीसरे ध्रुव के रूप में स्थापित हो जाएगा। लेकिन इसके विपरीत, यदि नतीजा अनुकूल नहीं रहा, तो पार्टी के जमीनी प्रभाव और उनकी भविष्य की चुनावी रणनीतियों पर गंभीर सवाल खड़े होंगे। एग्जिट पोल के अनुमान हालांकि कड़ी टक्कर दिखा रहे हैं।ऊंट किस करवट बैठेगा, इसका फैसला तो 3 अगस्त को ही होगा।
भाजपा की साख दांव पर
बांकीपुर सीट साल 1995 से भाजपा का सुरक्षित किला रही है। नितिन नवीन के राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई इस सीट को बचाना भाजपा के लिए नाक का सवाल है। चुनाव की शुरुआत में पार्टी ने अभिषेक कुमार सिन्हा को टिकट दिया था, लेकिन उनके नाम वापस लेने के बाद अचानक नीरज कुमार सिन्हा को मैदान में उतारना पड़ा। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम ने पार्टी के भीतर अंदरूनी समन्वय और टिकट वितरण की रणनीति पर कुछ सवाल जरूर खड़े किए। शहरी और मुख्य रूप से कायस्थ बहुल इस सीट पर अपनी पकड़ बनाए रखना भाजपा के लिए इसलिए भी जरूरी है ताकि वह राज्य में अपने ‘शहरी एकाधिकार’ के नैरेटिव को कमजोर न होने दे। उम्मीदवार के बदले जाने से कहीं न कहीं लोगों के मन में पार्टी के प्रति नाराजगी तो है, लेकिन वह नाराजगी किस रुप में प्रस्फुटित होगी यह देखना दिलचस्प होगा।
राजद की अग्नि परीक्षा
राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने एक बार फिर रेखा गुप्ता पर दांव खेलकर यह साफ कर दिया कि वह गैर-पारंपरिक और अति पिछड़ा/वैश्य वोटों में सेंध लगाने की पुरजोर कोशिश कर रही है। राजद का मुख्य उद्देश्य भाजपा विरोधी वोटों के बिखराव को रोकना और तेजस्वी यादव के ‘A to Z’ के नारे को जमीन पर सच साबित करना है। हालांकि, प्रशांत किशोर की मौजूदगी ने सत्ता पक्ष के साथ ही विपक्ष के वोट बैंक में भी हिस्सेदारी की चुनौती खड़ी कर दी है।
बांकीपुर का यह उपचुनाव किसी एक विधायक को चुनने भर का मामला नहीं है। तीन अगस्त को जब मतपेटियां खुलेंगी, तो केवल जीत-हार तय नहीं होगी, बल्कि यह भी तय होगा कि बिहार का जागरूक शहरी वोटर पारंपरिक ‘जाति और पार्टी’ के समीकरणों के साथ खड़ा है या वह प्रशांत किशोर के ‘नए विकल्प और नई राजनीति’ के प्रयोग को गले लगाने के लिए तैयार है। कम मतदान के बावजूद, इस चुनाव के परिणाम बिहार की भावी राजनीति में दूरगामी बदलाव के सूत्रधार बनेंगे।
