
- 18 बड़ी अस्पताल चेन चार साल में 40 हजार करोड़ रुपये खर्च कर जोड़ेंगी 34 हजार से अधिक बेड, नई क्षमता का करीब 40% छोटे शहरों में विकसित करने की योजना
- देश में अस्पताल बेड की कमी, गंभीर बीमारियों के बढ़ते मामले और बेहतर इलाज की मांग से विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी बढ़ी; सवाल यह कि मरीजों को सस्ती चिकित्सा मिलेगी या बढ़ेगा खर्च
मुंबई : महानगरों के बाद अब छोटे शहर भी अस्पताल कारोबार के बड़े केंद्र बनने की राह पर हैं। विदेशी निवेशकों को इन शहरों में बड़ी आबादी, विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधाओं की कमी और बेहतर इलाज की बढ़ती मांग में कारोबार का अवसर दिखाई दे रहा है। यही वजह है कि अमेरिका से लेकर सिंगापुर तक के बड़े निवेशक भारतीय अस्पताल चेन में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं। आने वाले वर्षों में छोटे शहरों में अस्पतालों की संख्या और बिस्तरों की क्षमता बढ़ाने की तैयारी है।
रेटिंग एजेंसी इक्रा के अनुमान के मुताबिक, देश की 18 बड़ी अस्पताल चेन अगले चार वर्षों में करीब 40 हजार करोड़ रुपये खर्च करके 34 हजार से अधिक बेड जोड़ सकती हैं। इनमें लगभग 40 प्रतिशत नई क्षमता छोटे शहरों में विकसित होने की उम्मीद है। इस विस्तार से मरीजों को स्थानीय स्तर पर बेहतर इलाज मिलने की संभावनाएं बढ़ेंगी। हालांकि, बड़ा सवाल यह है कि अस्पतालों में निवेश बढ़ने से क्या इलाज भी सस्ता होगा?
छोटे शहरों में क्यों बढ़ रही निवेशकों की दिलचस्पी?
भारत के छोटे शहरों में बड़ी आबादी रहती है, लेकिन कई जगहों पर गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए पर्याप्त विशेषज्ञ डॉक्टर, आधुनिक उपकरण और सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में मरीजों को बेहतर इलाज के लिए दूसरे शहरों का रुख करना पड़ता है। इससे इलाज के खर्च के अलावा यात्रा, होटल और परिवार के अन्य सदस्यों के रहने का खर्च भी बढ़ जाता है।
निवेशकों को इसी जरूरत में कारोबार का अवसर दिखाई दे रहा है। छोटे शहरों में अस्पताल खोलकर वे उन मरीजों तक पहुंच सकते हैं, जिन्हें फिलहाल बेहतर चिकित्सा सुविधाओं के लिए दूर जाना पड़ता है। इसके साथ ही बढ़ती आय, बुजुर्ग आबादी और कैंसर, हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज की मांग भी अस्पताल कारोबार के विस्तार को बढ़ावा दे रही है।
छोटे शहरों की आबादी भी बड़ा बाजार
अस्पताल कारोबार में निवेश करने वाली कंपनियों का मानना है कि छोटे शहरों में अस्पताल चलाना हमेशा घाटे का सौदा नहीं होता। इन शहरों की आबादी कई बार इतनी बड़ी होती है कि वहां आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की पर्याप्त मांग पैदा हो सकती है।
ब्लैकस्टोन समर्थित एस्टर डीएम क्वालिटी केयर के पास 39 अस्पताल और 10 हजार से अधिक बेड हैं। कंपनी अगले तीन से चार वर्षों में 5,000 अतिरिक्त बेड जोड़ने की योजना बना रही है। कंपनी का जोर उन इलाकों पर भी है, जहां आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की कमी है।
दक्षिण भारत के नागरकोइल में एस्टर के 210 बेड वाले अस्पताल का उदाहरण भी इसी बदलाव को दर्शाता है। इस अस्पताल के शुरू होने से स्थानीय मरीजों को इलाज के लिए लगभग 80 किलोमीटर दूर तिरुवनंतपुरम जाने की जरूरत कम हुई। इससे मरीजों और उनके परिजनों के यात्रा तथा ठहरने के खर्च में बचत की संभावना बनी।
विदेशी निवेशकों के लिए अस्पताल कारोबार क्यों खास?
भारत के अस्पताल कारोबार में ब्लैकस्टोन, केकेआर, टेमासेक, ईक्यूटी और जनरल अटलांटिक जैसे बड़े निवेशकों की दिलचस्पी रही है। ये निवेशक अस्पताल चेन के विस्तार, हिस्सेदारी खरीदने और कंपनियों की विकास योजनाओं में पूंजी लगा रहे हैं।
ईवाई के आंकड़ों के मुताबिक, वैश्विक निवेशकों ने पिछले पांच वर्षों में भारतीय अस्पताल चेन में करीब 10 अरब डॉलर यानी लगभग 94,965 करोड़ रुपये का निवेश किया है।
निवेशकों को इस क्षेत्र में लंबे समय तक बनी रहने वाली मांग, अस्पतालों के विस्तार और कंपनियों के मूल्यांकन में बढ़ोतरी की संभावना दिखाई देती है। इसके अलावा, आईपीओ या हिस्सेदारी बेचकर निवेश से बाहर निकलने का विकल्प भी उन्हें आकर्षित करता है।
हालांकि, अस्पताल कारोबार में मुनाफा तय नहीं होता। नए अस्पतालों के निर्माण, उपकरणों की खरीद, डॉक्टरों और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति तथा अस्पताल के संचालन पर भारी खर्च होता है। इसलिए निवेश की सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि अस्पताल कितने मरीजों को गुणवत्तापूर्ण इलाज दे पाता है और उसकी लागत कितनी रहती है।
24 लाख बेड की कमी में छिपा कारोबार का अवसर
एसोसिएशन ऑफ हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स इंडिया के अनुमान के मुताबिक, देश में लगभग 24 लाख अस्पताल बेड की कमी है। वहीं, उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारत में प्रति एक हजार आबादी पर अस्पताल बेड की संख्या भी कम है।
इस कमी के कारण अस्पतालों की नई क्षमता विकसित करने की जरूरत महसूस की जा रही है। निजी क्षेत्र पहले से ही देश की स्वास्थ्य व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 60 प्रतिशत भर्ती और 70 प्रतिशत ओपीडी इलाज निजी क्षेत्र में होता है।
ऐसे में अस्पतालों का विस्तार केवल कारोबारी गतिविधि नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता से भी जुड़ा हुआ है। हालांकि, नई सुविधाएं विकसित होने के बावजूद उनका लाभ तभी व्यापक होगा, जब मरीजों को उचित कीमत पर इलाज मिल सके।
इलाज का खर्च बनेगा सबसे बड़ी चुनौती
भारत में इलाज का खर्च परिवारों के लिए बड़ी चिंता है। उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक, परिवार स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च का करीब 40 प्रतिशत अपनी जेब से उठाते हैं। मेडिकल महंगाई की दर भी सालाना 12 से 14 प्रतिशत बताई गई है।
संसदीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार, निजी अस्पताल में भर्ती होने का औसत खर्च करीब 50 हजार रुपये है, जबकि सरकारी अस्पताल में यह लगभग 6,650 रुपये बताया गया है। हालांकि, वास्तविक खर्च बीमारी, अस्पताल, इलाज की प्रकृति और मरीज की स्थिति के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।
ऐसे में अस्पतालों में विदेशी निवेश बढ़ने के दो पहलू हैं। एक ओर आधुनिक उपकरण, बेहतर बुनियादी ढांचा और विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ सकती है। दूसरी ओर, यदि इलाज की कीमतें मरीजों की भुगतान क्षमता के अनुरूप नहीं रहीं, तो नई सुविधाओं का लाभ सीमित रह सकता है।
निवेश के साथ मरीजों के हितों की सुरक्षा भी जरूरी
अस्पतालों में निवेश बढ़ने से स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार हो सकता है, लेकिन इसके साथ इलाज की कीमत, बिलिंग में पारदर्शिता और गुणवत्तापूर्ण सेवाओं की उपलब्धता पर भी ध्यान देना होगा।
निजी निवेश से विकसित अस्पतालों में गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को इलाज कैसे उपलब्ध होगा, यह महत्वपूर्ण सवाल है। स्वास्थ्य बीमा, सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं और अस्पतालों की जवाबदेही की भूमिका भी इसमें अहम होगी।
अस्पतालों की संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। मरीजों को समय पर इलाज, उचित कीमत और बेहतर चिकित्सा सेवाएं मिलना भी उतना ही जरूरी है। इसलिए छोटे शहरों में विदेशी निवेश का वास्तविक लाभ इस बात से तय होगा कि इससे केवल अस्पताल कारोबार बढ़ता है या आम लोगों की स्वास्थ्य सुविधाओं में भी सुधार आता है।
अस्पताल कारोबार का विस्तार
छोटे शहरों में अस्पताल कारोबार का विस्तार भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण अवसर पैदा कर सकता है। बड़ी आबादी, विशेषज्ञ इलाज की जरूरत और अस्पताल बेड की कमी निवेशकों को आकर्षित कर रही है। आने वाले वर्षों में हजारों नए बेड जुड़ने की संभावना है। लेकिन इस विस्तार की असली सफलता तभी होगी, जब बेहतर इलाज के साथ उसकी कीमत भी आम मरीजों की पहुंच में रहे।












