
जमशेदपुर: जुलाई माह को दुनियाभर में सारकोमा जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर टाटा मेन हॉस्पिटल (TMH) के मेडिकल इंडोर सर्विसेज के एसोसिएट स्पेशलिस्ट डॉ. आयुष चौधरी ने कहा कि सारकोमा एक दुर्लभ लेकिन गंभीर कैंसर है, जिसकी समय पर पहचान और सही इलाज से मरीजों के स्वस्थ होने की संभावना पहले की तुलना में काफी बढ़ गई है।
डॉ. चौधरी ने बताया कि सारकोमा शरीर के कनेक्टिव टिश्यू, जैसे मांसपेशियों, हड्डियों, वसा, नसों और रक्त वाहिकाओं में विकसित होने वाला कैंसर है। वयस्कों में यह कैंसर एक प्रतिशत से भी कम मामलों में पाया जाता है, लेकिन बच्चों और किशोरों में होने वाले करीब 10 से 15 प्रतिशत कैंसर इसी श्रेणी के होते हैं। उन्होंने कहा कि शरीर में बनने वाली हर गांठ सामान्य नहीं होती। यदि कोई गांठ लगातार बढ़ रही हो, पांच सेंटीमीटर से अधिक हो, गहराई में महसूस हो, दोबारा उभर आए या उसके साथ दर्द हो, तो तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सक से जांच करानी चाहिए।
उन्होंने बताया कि सारकोमा की पुष्टि के लिए एमआरआई, सीटी स्कैन और बायोप्सी जैसी जांच जरूरी होती है। बीमारी के प्रकार के अनुसार मॉलिक्यूलर टेस्ट भी किए जाते हैं, जिससे मरीज के लिए सबसे उपयुक्त उपचार तय किया जा सके। उन्होंने कहा कि बिना उचित योजना के की गई सर्जरी आगे के इलाज को जटिल बना सकती है, इसलिए उपचार हमेशा विशेषज्ञों की मल्टीडिसिप्लिनरी टीम की निगरानी में होना चाहिए। डॉ. चौधरी ने कहा कि पिछले दो दशकों में सारकोमा के इलाज में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। अब कई मामलों में पहले की तरह हाथ या पैर काटने की जरूरत नहीं पड़ती। आधुनिक लिंब-सेल्वेज सर्जरी, रेडियोथेरेपी, कीमोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी और नई इम्यूनोथेरेपी जैसी तकनीकों से प्रभावित अंग को सुरक्षित रखते हुए भी सफल उपचार संभव हो रहा है।
उन्होंने लोगों से अपील की कि शरीर में लंबे समय तक बनी रहने वाली गांठ, सूजन या हड्डियों में लगातार दर्द को नजरअंदाज न करें। समय पर जांच और विशेषज्ञ केंद्र में इलाज ही सारकोमा से लड़ाई का सबसे प्रभावी तरीका है।
