
चाईबासा : झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं ओडिशा के पूर्व राज्यपाल रघुवर दास ने खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन कानून-2026 का समर्थन किया है। चाईबासा दौरे के दौरान आयोजित प्रेस वार्ता में उन्होंने दावा किया कि नया कानून झारखंड के हित में है और इससे खनिज राजस्व के रूप में राज्य को लगभग 30 प्रतिशत अतिरिक्त आर्थिक लाभ मिल सकता है।
कानून का विरोध करने वालों पर उठाए सवाल
रघुवर दास ने कहा कि संशोधित कानून का विरोध करने से पहले उसके प्रावधानों को विस्तार से समझना जरूरी है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग इसलिए इसका विरोध कर रहे हैं, क्योंकि इससे खनिज क्षेत्रों में कथित अवैध वसूली और सिंडिकेट पर अंकुश लग सकता है। उनके मुताबिक, अवैध खनन का नुकसान सरकार के साथ-साथ स्थानीय जनता को भी उठाना पड़ता है।
खनिज संपदा के बावजूद अपेक्षित राजस्व नहीं
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि झारखंड कोयला, लौह अयस्क और अन्य खनिज संसाधनों से समृद्ध है, लेकिन इसके अनुरूप राज्य को राजस्व नहीं मिल रहा। उन्होंने ओडिशा और छत्तीसगढ़ का उदाहरण देते हुए कहा कि इन राज्यों को खनिज संपदा से बड़ी आय प्राप्त होती है, जबकि झारखंड इस मामले में अभी पीछे है। पश्चिमी सिंहभूम की खदानों का उल्लेख करते हुए उन्होंने दावा किया कि कई बंद खदानों के आसपास अवैध खनन जारी है। इससे रोजगार, राजस्व और क्षेत्रीय विकास—तीनों प्रभावित हो रहे हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है।
डीएमएफटी राशि से स्थानीय विकास की मांग
रघुवर दास ने जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट यानी डीएमएफटी की राशि के उपयोग पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि खनन से मिलने वाले राजस्व का वास्तविक लाभ प्रभावित गांवों और स्थानीय समुदायों तक पहुंचना चाहिए। खनन क्षेत्रों में पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क और रोजगार जैसी सुविधाओं को प्राथमिकता देने की जरूरत है। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ खनन प्रभावित इलाकों के ग्रामीण आज भी दूषित अथवा ‘लाल पानी’ पीने को मजबूर हैं। पूर्व मुख्यमंत्री के अनुसार, उनके कार्यकाल में डीएमएफटी राशि का प्रमुख उद्देश्य ग्रामीणों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना था।
विपक्ष को न्यायालय जाने की सलाह
झामुमो पर निशाना साधते हुए रघुवर दास ने कहा कि जल, जंगल, जमीन और आदिवासी-मूलवासी हितों की बात करने वाली सरकार के कार्यकाल में इन्हीं समुदायों की समस्याएं बनी हुई हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि संशोधन कानून से राज्यों के भूमि या खनिज अधिकार समाप्त नहीं होते। उनका दावा है कि कर और वैधानिक भुगतानों में राज्यों की हिस्सेदारी बरकरार रहेगी। उन्होंने कहा कि यदि राज्य सरकार को कानून के किसी प्रावधान पर आपत्ति है तो वह न्यायालय का रास्ता अपना सकती है, लेकिन केवल राजनीतिक विरोध से झारखंड का हित नहीं होगा।











