
चक्रधरपुर : खेतों की खुशहाली की कामना, पारंपरिक वाद्यों की धुन और एक-दूसरे से मिलकर रिश्तों में मिठास घोलने की परंपरा—झारखंड के जनजातीय समुदायों में मनाया जाने वाला दासाय पर्व इन्हीं रंगों को समेटे हुए है। दुर्गोत्सव के अवसर पर मनाए जाने वाले इस पर्व में धार्मिक आस्था के साथ खेती, प्रकृति और सामुदायिक जीवन का गहरा जुड़ाव दिखाई देता है। इसकी खासियत केवल पूजा-अर्चना नहीं, बल्कि गांवों को आपसी सहयोग और भाईचारे से जोड़ने वाली परंपराएं भी हैं।
गीत और नृत्य के साथ घर-घर पहुंचता है निमंत्रण
दासाय की तैयारी करीब एक महीने पहले शुरू हो जाती है। पारंपरिक गीत गाते और नृत्य करते हुए लोग गांवों तथा टोलों में पहुंचकर पर्व का निमंत्रण देते हैं। इस दौरान ग्रामीण अपनी सामर्थ्य के अनुसार चावल, तेल और आर्थिक सहयोग देते हैं। तैयारी का यह सामूहिक तरीका उत्सव में हर परिवार की भागीदारी सुनिश्चित करता है। गांवों के बीच आने-जाने और मेल-मिलाप से सामाजिक संबंध भी मजबूत होते हैं।
नौ वनस्पतियों की पूजा में झलकता है प्रकृति का सम्मान
महाअष्टमी पर नौ प्रकार की वनस्पतियों को सजाकर विधि-विधान से पूजा की जाती है। इनमें केला, अरबी, हल्दी, जयंती, बेल, डालिम, अशोक, धान और मान शामिल हैं। इस नवपत्रिका पूजन में खेती और हरियाली के प्रति सम्मान का भाव दिखाई देता है। कृषि से जुड़े अनुष्ठानों के कारण इसे कृषि पर्व या शस्य उत्सव भी कहा जाता है। स्थानीय जनजातीय समूहों में इसके आयोजन की अपनी अलग परंपराएं भी प्रचलित हैं।
‘जागरण’ की शाम फसलों की खुशहाली की कामना
अष्टमी के दिन को जागरण भी कहा जाता है। शाम ढलने पर किसान अरवा चावल के आटे को दूध या पानी में मिलाकर घोल तैयार करते हैं। परंपरा के अनुसार इसका छिड़काव फसलों, पेड़-पौधों और घरेलू सामान पर किया जाता है। समुदाय की मान्यता है कि यह अनुष्ठान फसलों की रक्षा और अच्छी पैदावार की कामना से जुड़ा है। यह लोकविश्वास पीढ़ियों से पर्व का हिस्सा बना हुआ है।
नवमी पर पूजा, दशमी पर रिश्तों में मिठास
नवमी को विशेष पूजा-अर्चना और शुभ अनुष्ठानों का दिन माना जाता है। वहीं विजयादशमी पर मेल-मिलाप का रंग और गहरा हो जाता है। लोग पड़ोस तथा परिचित परिवारों के घर जाकर बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श करते हैं और आशीर्वाद लेते हैं। घरों में विशेष पकवान बनाए जाते हैं। आपसी भेदभाव भुलाकर मिलने की यह परंपरा उत्सव को सामाजिक एकता का अवसर बनाती है।
मेलों में जीवंत होती है सांस्कृतिक पहचान
कई गांवों में दासाय के अवसर पर दस दिवसीय मेले भी लगते हैं। पारंपरिक गीतों और सामूहिक नृत्य में युवक-युवतियां उत्साह से भाग लेते हैं। वेशभूषा, वाद्य और लोकधुनों के माध्यम से समुदाय अपनी सांस्कृतिक पहचान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाता है। इस तरह दासाय आस्था के साथ प्रकृति, श्रम और रिश्तों के सम्मान का उत्सव बनकर सामने आता है।











