
- छाप पुस्तक महोत्सव 3.0 का भव्य समापन, बलिया से बॉलीवुड तक के सफर की सुनाई कहानी; साहित्य, संगीत और विचारों के संग यादगार बनी आखिरी शाम
जमशेदपुर : बलिया से बनारस, बीएचयू से जेएनयू और फिर मुंबई तक का सफर। संघर्ष, सपने और सफलता की इस कहानी को जब बॉलीवुड के मशहूर गीतकार डॉ. सागर ने अपने अंदाज में सुनाया, तो श्रोता उनके साथ सफर करते नजर आए। साहित्य कला फाउंडेशन की ओर से आयोजित ‘छाप पुस्तक महोत्सव 3.0’ के दूसरे और अंतिम दिन डॉ. सागर आकर्षण का केंद्र रहे। उन्होंने बताया कि कैसे ‘बम्बई में का बा’ गीत ने उनके करियर को बड़ा ब्रेक दिया और बॉलीवुड में पहचान दिलाई। दो दिवसीय महोत्सव का समापन साहित्य, संगीत और खूबसूरत यादों के साथ हुआ।
‘बम्बई में का बा’ से बदली किस्मत, बॉलीवुड में खुलते गए रास्ते
डॉ. सागर ने वैभव मणि त्रिपाठी के साथ रोचक संवाद में अपने जीवन के कई अनसुने किस्से साझा किए। उन्होंने बताया कि बलिया से शुरू हुआ उनका सफर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) से होते हुए मुंबई पहुंचा। यहां उनकी प्रतिभा को पहचान मिली और ‘बम्बई में का बा’ उनके करियर का अहम मोड़ बन गया। अभिनेता मनोज बाजपेयी ने इस गीत को रैप के अंदाज में प्रस्तुत किया था।
इसके बाद उनके पास एक के बाद एक काम के प्रस्ताव आने लगे। डॉ. सागर ने बताया कि अभिनेता विक्रांत मैसी के लिए लिखे गए एक रैप सॉन्ग के लिए उन्हें तीन लाख रुपये पारिश्रमिक मिला। यह रकम उनके लिए भी किसी आश्चर्य से कम नहीं थी। उनके संघर्ष और सफलता की कहानी ने युवाओं को सपने देखने और उनके लिए लगातार मेहनत करने की प्रेरणा दी।
स्त्री के संघर्ष से स्वतंत्रता तक, साहित्य पर हुई गंभीर बहस
महोत्सव के अंतिम दिन साहित्य की अलग-अलग विधाओं और सामाजिक सवालों पर भी चर्चा हुई। कथाकार कविता से सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज की बातचीत स्त्री के संघर्ष पर केंद्रित रही। वहीं, उपन्यासकार विनीता अस्थाना से विनीता परमार के संवाद में स्त्री की स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के बीच की सीमा पर चर्चा हुई।
इन सत्रों में साहित्य के माध्यम से समाज, स्त्री के अनुभवों और बदलते नजरिये को समझने की कोशिश की गई। श्रोताओं ने लेखकों की रचनात्मक यात्रा और उनके विचारों को ध्यान से सुना।
बांग्ला, उर्दू और अंग्रेजी साहित्य ने भी बिखेरे रंग
हिंदी साहित्य के साथ महोत्सव में दूसरी भाषाओं की पुस्तकों और उनके रचनाकारों को भी जगह मिली। कोलकाता से आए चर्चित बांग्ला कवि सुबोध सरकार की पुस्तक ‘बेलूर ठेके बासनापुर’ में शामिल कविताओं पर बेबी शॉ ने संवाद किया।
उर्दू के चर्चित उपन्यासकार खालिद जावेद से अख्तर आजाद की बातचीत भी खास रही। उनके उपन्यास ‘नेमतखाना’ के केंद्र में रसोईघर और बावर्चीखाना है, जिसके माध्यम से जीवन और समाज के विभिन्न पहलुओं को सामने लाया गया।
वहीं, चाईबासा निवासी पंकज दुबे की अंग्रेजी पुस्तक ‘वन स्ट्रिंग अटैच्ड’ पर करीम सिटी कॉलेज के मास कम्यूनिकेशन विभाग की अध्यक्ष डॉ. नेहा तिवारी ने संवाद किया। इस सत्र को भी श्रोताओं ने खूब पसंद किया।
‘अक्षर’ स्मारिका का लोकार्पण, आरटीआई पर भी हुई चर्चा
महोत्सव के दौरान ‘छाप पुस्तक महोत्सव’ की स्मारिका ‘अक्षर’ का लोकार्पण किया गया। इसका संपादन डॉ. अशोक झा अविचल ने किया है। स्मारिका के जरिए आयोजन की साहित्यिक गतिविधियों और रचनात्मक विमर्श को दस्तावेजी रूप दिया गया।
इसके बाद झारखंड के सूचना आयुक्त अनुज सिन्हा से संदीप मुरारका ने बातचीत की। इस संवाद में वरिष्ठ पत्रकार श्याम किशोर चौबे और प्रभात खबर, जमशेदपुर के संपादक संजय मिश्र ने भी भाग लिया। चर्चा का प्रमुख विषय सूचना का अधिकार (आरटीआई) रहा।
‘कहो कालिदास’ पर संवाद, रेडियो वाइब की लॉन्चिंग
अंतिम दिन उपन्यासकार युगल जोशी की पुस्तक ‘कहो कालिदास’ पर नवीन चौधरी के साथ संवाद हुआ। साहित्य और रचनात्मक अभिव्यक्ति पर केंद्रित इस सत्र के दौरान नवीन चौधरी की वेबसाइट ‘रेडियो वाइब’ की लॉन्चिंग भी की गई।
कार्यक्रम में आईजी अनूप बिरथरे की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। उन्होंने साहित्यिक आयोजन की सराहना करते हुए आयोजकों के प्रयासों की प्रशंसा की।
कविताओं की धुन के साथ हुआ समापन
दो दिवसीय महोत्सव का समापन संगीत और कविता के अनूठे संगम के साथ हुआ। भूपिंदर सिंह खिड़िया की कविताओं को संगीतमय अंदाज में प्रस्तुत किया गया, जबकि आशुतोष शिंदे ने तबले पर शानदार संगत की। साहित्य और संगीत के इस मेल ने आयोजन की अंतिम शाम को यादगार बना दिया।
कुल मिलाकर, ‘छाप पुस्तक महोत्सव 3.0’ साहित्यकारों, लेखकों, पाठकों और साहित्यप्रेमियों को विचारों के आदान-प्रदान का मंच देने में सफल रहा। दो दिनों तक चली चर्चाओं, किताबों, कविताओं और रचनाकारों की कहानियों के साथ प्रतिभागी खूबसूरत यादें लेकर विदा हुए।












