
- तीन वैज्ञानिकों की खोज ने खोला दिमाग की बीमारियों को समझने और भविष्य में इलाज का नया रास्ता, पार्किंसन से मिर्गी और डिप्रेशन तक पर असर
नई दिल्ली : मस्तिष्क की जटिल गतिविधियों को समझने की दिशा में बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि के लिए तीन वैज्ञानिकों को 2026 का चिकित्सा क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार दिया गया है। वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक विकसित करने में अहम भूमिका निभाई, जिसके जरिए प्रकाश की मदद से मस्तिष्क की खास तंत्रिका कोशिकाओं यानी न्यूरॉन्स की गतिविधियों को नियंत्रित किया जा सकता है।
इस खोज ने न्यूरोसाइंस की दुनिया में नई संभावनाएं पैदा की हैं। वैज्ञानिक अब यह समझने में सक्षम हो रहे हैं कि मस्तिष्क की अलग-अलग नसें किस तरह काम करती हैं और किसी बीमारी के दौरान उनके सर्किट में किस तरह के बदलाव आते हैं।
प्रकाश से दिमाग को नियंत्रित करने की तकनीक
इस क्रांतिकारी तकनीक को ऑप्टोजेनेटिक्स कहा जाता है। इसमें प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीन और आनुवंशिक तकनीक की मदद से खास न्यूरॉन्स को प्रकाश के जरिए सक्रिय या निष्क्रिय किया जाता है।
इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत इसकी सटीकता है। वैज्ञानिक मस्तिष्क के किसी खास हिस्से में मौजूद चुनिंदा न्यूरॉन्स की गतिविधि को नियंत्रित करके यह पता लगा सकते हैं कि उनका व्यवहार, याददाश्त, भावनाओं या बीमारी से क्या संबंध है।
शैवाल से शुरू हुई खोज, पहुंची दिमाग तक
इस खोज की कहानी एकल-कोशिकीय हरे शैवाल से शुरू हुई। पीटर हेगेमन और जॉर्ज नागेल ने यह अध्ययन किया कि कुछ हरे शैवाल प्रकाश की ओर कैसे तैरते हैं।
इसी शोध के दौरान प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीन की महत्वपूर्ण भूमिका सामने आई। नीली रोशनी पड़ने पर यह प्रोटीन कोशिका में आयनों के लिए चैनल खोल सकता है, जिससे विद्युत संकेत पैदा होते हैं।
यहीं से वैज्ञानिकों को यह विचार मिला कि प्रकाश की मदद से कोशिकाओं की विद्युत गतिविधि को नियंत्रित किया जा सकता है।
दिमाग में तैयार हुआ ‘लाइट स्विच’
कार्ल डीसेरोथ ने प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीन को नियंत्रित करने वाले जीन का इस्तेमाल तंत्रिका कोशिकाओं को प्रकाश के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए किया।
इसके बाद जीवित चूहों के मस्तिष्क में प्रकाश के जरिए न्यूरॉन्स की गतिविधियों को नियंत्रित करने के प्रयोग किए गए। इस काम ने ऑप्टोजेनेटिक्स को न्यूरोसाइंस के बेहद महत्वपूर्ण शोध उपकरण के रूप में स्थापित किया।
- पार्किंसन में नई उम्मीद : पार्किंसन जैसी बीमारी में मस्तिष्क के कुछ तंत्रिका सर्किट प्रभावित होते हैं। ऑप्टोजेनेटिक्स की मदद से वैज्ञानिक इन सर्किट को बेहतर ढंग से समझने और यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि कौन से न्यूरॉन्स बीमारी के लक्षणों से जुड़े हैं।
- मिर्गी के दौरे को समझने में मदद : मिर्गी में मस्तिष्क के कुछ न्यूरॉन्स असामान्य तरीके से सक्रिय हो सकते हैं। प्रकाश की मदद से विशेष न्यूरॉन्स और उनके सर्किट का अध्ययन करने से दौरे की प्रक्रिया को समझने में नई संभावनाएं बनी हैं।
- डिप्रेशन और भावनाओं पर भी रिसर्च : मूड, भावनाओं और व्यवहार से जुड़े मस्तिष्क सर्किट बेहद जटिल होते हैं। ऑप्टोजेनेटिक्स ने वैज्ञानिकों को इन सर्किट के अलग-अलग हिस्सों की भूमिका को अधिक सटीक तरीके से समझने का रास्ता दिया है।
- याददाश्त से जुड़ी बीमारियों पर भी नजर : याददाश्त बनाने और उसे नियंत्रित करने वाले न्यूरॉन्स का अध्ययन भी इस तकनीक के जरिए किया जा रहा है। इससे अल्जाइमर जैसी याददाश्त से जुड़ी बीमारियों को समझने के लिए भविष्य में नई दिशा मिल सकती है।
- दृष्टि बहाल करने की भी उम्मीद : प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीनों पर आधारित तकनीकों का इस्तेमाल दृष्टि संबंधी समस्याओं के अध्ययन में भी किया जा रहा है। वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्षतिग्रस्त दृश्य तंत्र में प्रकाश के जरिए किस तरह मदद पहुंचाई जा सकती है।
क्यों खास है यह खोज?
मस्तिष्क में अरबों तंत्रिका कोशिकाएं एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। किसी बीमारी में कौन-सी कोशिका या कौन-सा सर्किट जिम्मेदार है, यह पता लगाना बेहद मुश्किल रहा है। ऑप्टोजेनेटिक्स ने वैज्ञानिकों को इन न्यूरॉन्स को बेहद सटीक तरीके से सक्रिय या निष्क्रिय करके उनके काम को समझने का मौका दिया है।
भविष्य में इलाज की नई राह
ऑप्टोजेनेटिक्स का बड़ा इस्तेमाल अभी वैज्ञानिक शोध में हो रहा है, लेकिन इस तकनीक ने न्यूरोलॉजिकल और मानसिक बीमारियों के भविष्य के इलाज के लिए नई उम्मीद जगाई है। आने वाले वर्षों में मस्तिष्क के खास सर्किट को लक्ष्य बनाकर उपचार विकसित करने की दिशा में यह खोज महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।












