
रांची : बेटे की मौत से जुड़े मामले में झारखंड हाई कोर्ट ने 88 वर्षीय गोमा गोप की आजीवन कारावास की सजा में बदलाव किया है। अदालत ने घटना की परिस्थितियों पर विचार करते हुए हत्या की दोषसिद्धि को गैर इरादतन हत्या में बदल दिया। साथ ही, सजा को जेल में पहले से बिताई गई अवधि तक सीमित कर दिया है। जस्टिस आनंद सेन और जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने गोमा गोप की अपील पर यह फैसला सुनाया। अदालत के सामने प्रमुख सवाल था कि अचानक हुए विवाद में चाकू से किया गया एक वार हत्या की श्रेणी में आएगा या गैर इरादतन हत्या के दायरे में।
पूर्व योजना के प्रमाण नहीं मिले
अदालत ने पाया कि घटना अचानक हुए विवाद और आवेश के दौरान हुई थी। हत्या की पहले से योजना बनाए जाने के प्रमाण नहीं मिले। मेडिकल साक्ष्यों में भी चाकू से एक ही वार किए जाने की बात सामने आई। इन परिस्थितियों के आधार पर हाई कोर्ट ने दोषसिद्धि भारतीय दंड संहिता की धारा 302 से बदलकर धारा 304 भाग–दो के तहत कर दी। सजा तय करते समय दोषी की अधिक उम्र और हिरासत में बिताई गई अवधि को भी ध्यान में रखा गया।
हड़िया पीने पर टोकने से शुरू हुआ विवाद
अभियोजन के अनुसार, घटना 21 नवंबर 2013 की है। गोमा गोप घर में हड़िया पी रहा था। इसी दौरान उसका 20 वर्षीय बेटा प्रताप गोप घर लौटा और पिता के अधिक शराब पीने पर सवाल उठाया। इस बात को लेकर दोनों के बीच कहासुनी हुई। विवाद के दौरान पिता ने सब्जी काटने वाले चाकू से बेटे के पेट में वार कर दिया। गंभीर चोट और अत्यधिक रक्तस्राव के कारण बेटे की मौके पर ही मौत हो गई। घटना की सूचना गोमा गोप की पत्नी जेमा गोप ने पुलिस को दी थी। इसके बाद हत्या का मामला दर्ज कर जांच शुरू हुई।
2018 में सुनाई गई थी उम्रकैद
मामले की सुनवाई के बाद चाईबासा स्थित पश्चिमी सिंहभूम के तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश की अदालत ने 24 अगस्त 2018 को गोमा गोप को दोषी ठहराया था। निचली अदालत ने उसे आजीवन कारावास और पांच हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसी फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। अपील में बचाव पक्ष ने कहा कि गोमा गोप को गलत तरीके से फंसाया गया है और वह लंबे समय से जेल में बंद है। दूसरी ओर, राज्य सरकार ने सजा बरकरार रखने की मांग की।
दोषसिद्धि कायम, अपराध की श्रेणी बदली
हाई कोर्ट का फैसला गोमा गोप को बरी करने का नहीं है। अदालत ने घटना के लिए उसकी आपराधिक जिम्मेदारी कायम रखते हुए अपराध की कानूनी श्रेणी और सजा में बदलाव किया है। मामले की परिस्थितियों को देखते हुए पहले से काटी गई जेल अवधि को ही पर्याप्त सजा माना गया।












