
- आरटीआइ से हुआ खुलासा: अस्पतालों, औद्योगिक इकाइयों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को नोटिस, जनरेटर से निकलने वाले जहरीले धुएं पर शिकंजा
जमशेदपुर : शहर की हवा को जहरीला बनाने वाले डीजल जनरेटरों के धुएं पर अब झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण परिषद ने सख्ती दिखाई है। टाटा स्टील समेत जमशेदपुर के 12 प्रमुख औद्योगिक और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को नोटिस जारी कर प्रदूषण नियंत्रण के नियमों का पालन करने का निर्देश दिया गया है। सभी संबंधित संस्थानों को नोटिस मिलने की तारीख से छह महीने यानी 180 दिनों के भीतर उत्सर्जन नियंत्रण के उपाय करने होंगे। नियमों का उल्लंघन करने पर जनरेटर की क्षमता और लापरवाही के आधार पर प्रतिदिन 7,500 रुपये से लेकर 25,000 रुपये तक पर्यावरणीय मुआवजा वसूले जाने का प्रावधान है।
यह मामला सूचना का अधिकार (आरटीआइ) अधिनियम के तहत मिली जानकारी के आधार पर झारखंड मानवाधिकार सम्मेलन ने उठाया है। इससे शहर में डीजल जनरेटर से होने वाले वायु प्रदूषण और उस पर सरकारी निगरानी को लेकर सवाल खड़े हुए हैं।
टाटा स्टील से अस्पतालों तक को नोटिस
झारखंड मानवाधिकार सम्मेलन के केंद्रीय अध्यक्ष मनोज मिश्रा के अनुसार, प्रदूषण नियंत्रण परिषद की ओर से नोटिस पाने वाले संस्थानों में टाटा स्टील, टीआरएफ, टाटा पिगमेंट, एसटीपी लिमिटेड, शिवा प्लास्टिक, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड और टेल्को शामिल हैं।
इसके अलावा टाटा मेन अस्पताल, टाटा मोटर्स अस्पताल और टिनप्लेट अस्पताल को भी नोटिस जारी किया गया है। व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में होटल साउथ पार्क और मिथिला मोटर्स के नाम शामिल हैं।
इन सभी संस्थानों को डीजल जनरेटर से निकलने वाले धुएं और हानिकारक कणों को नियंत्रित करने के लिए उचित तकनीकी उपाय अपनाने का निर्देश दिया गया है।
जनरेटर का धुआं सांस के लिए खतरनाक
बिजली कटने पर डीजल जनरेटर वैकल्पिक बिजली स्रोत के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं। लेकिन इनसे निकलने वाले सूक्ष्म कण और नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसें हवा को प्रदूषित करती हैं। लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से सांस संबंधी बीमारियों और अस्थमा का खतरा बढ़ सकता है। बच्चों और बुजुर्गों पर इसका विशेष असर पड़ सकता है।
प्रदूषण नियंत्रण परिषद ने जनरेटर की क्षमता के अनुसार रेट्रोफिट उत्सर्जन नियंत्रण उपकरण लगाने सहित अन्य अनुमत तकनीकी उपाय अपनाने का निर्देश दिया है। इन उपायों का उद्देश्य जनरेटर से निकलने वाले हानिकारक उत्सर्जन को कम करना है।
लापरवाही पर हर दिन 25 हजार रुपये तक का मुआवजा
आरटीआइ से मिली जानकारी के मुताबिक, प्रदूषण नियंत्रण संबंधी निर्देशों का पालन नहीं करने पर जनरेटर की क्षमता और उल्लंघन की स्थिति के आधार पर प्रतिदिन 7,500 रुपये, 15,000 रुपये और 25,000 रुपये तक पर्यावरणीय मुआवजा वसूलने का प्रावधान है।
झारखंड मानवाधिकार सम्मेलन के अध्यक्ष मनोज मिश्रा ने कहा कि स्वच्छ हवा में सांस लेना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। औद्योगिक विकास और रोजगार जरूरी हैं, लेकिन पर्यावरण और जनस्वास्थ्य की कीमत पर नहीं। प्रदूषण नियंत्रण के नियमों को कागजों से निकालकर जमीन पर सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।
180 दिनों में कार्रवाई, निगरानी पर नजर
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि संबंधित संस्थान निर्धारित समयसीमा के भीतर उत्सर्जन नियंत्रण के उपाय कितनी गंभीरता से अपनाते हैं। साथ ही, प्रदूषण नियंत्रण परिषद इन संस्थानों की निगरानी कैसे करती है और नियमों का उल्लंघन मिलने पर मुआवजा वसूलने सहित क्या कार्रवाई करती है, इस पर भी शहरवासियों की नजर रहेगी।












