
दुमका : संताल आदिवासी समाज की धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक पहचान और एकजुटता को मजबूत करने के उद्देश्य से आगामी 10 नवंबर को दुमका के बिरसा मुंडा आउटडोर स्टेडियम में धर्म सम्मेलन सह सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। आयोजन की तैयारियों को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में बैठकों का सिलसिला तेज हो गया है। रानीश्वर प्रखंड के विभिन्न गाँवों में सामाजिक अगुआ लोगों से संपर्क कर सम्मेलन में भागीदारी की अपील कर रहे हैं।
गाँवों की बैठकों में बन रही तैयारी की रूपरेखा
दिसोम मांझी थान और जाहेर थान समिति के बैनर तले होने वाले इस आयोजन को सफल बनाने के लिए गाँव स्तर पर जिम्मेदारियाँ तय की जा रही हैं। कठलिया, गुलामशुली, डूहुमुर्गा, रखालपहाड़ी, कुरुशिला और मोहनपुर सहित आसपास के गाँवों में ग्रामीण सामूहिक रूप से तैयारियों पर चर्चा कर रहे हैं। इन बैठकों की अगुवाई ‘आतु मोड़े होड़’ यानी गाँव के पारंपरिक सामाजिक अगुआ कर रहे हैं। हर परिवार तक सम्मेलन का संदेश पहुँचाने के साथ ही दुमका जाने वाले लोगों की सूची भी तैयार की जा रही है। प्रयास है कि गाँवों से लोग एक साथ आयोजन स्थल तक पहुँचें।
छोटे अंशदान से सामूहिक भागीदारी का संदेश
सम्मेलन की तैयारियों में ग्रामीणों का एक खास संकल्प सामने आया है। मरांग बुरु के श्रद्धालु आयोजन स्थल पर अपने साथ एक मुट्ठी चावल और पाँच रुपये का सहयोग लेकर पहुँचेंगे। इस पहल के जरिए सम्मेलन को सामुदायिक सहयोग और आत्मनिर्भरता से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। ग्रामीणों के लिए यह अंशदान केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं है। इसके माध्यम से प्रत्येक परिवार को आयोजन से जोड़ने और साझा जिम्मेदारी की भावना मजबूत करने का संदेश दिया जा रहा है। छोटी-छोटी भागीदारी से पूरे समाज की एकजुटता दिखाने की तैयारी है।
पारंपरिक पोशाक में दिखेगी सांस्कृतिक पहचान
बैठकों में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया है कि श्रद्धालु सम्मेलन में पारंपरिक आदिवासी परिधान पहनकर शामिल होंगे। पुरुष पंची और महिलाएँ पंची-पाहान में आयोजन स्थल पहुँचेंगी। नई और पुरानी पीढ़ी की संयुक्त मौजूदगी के जरिए संताल समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सामने लाने पर जोर दिया जा रहा है। धर्म सम्मेलन के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होगा। आयोजकों का उद्देश्य धार्मिक आस्था के साथ भाषा, रीति-रिवाज और सामाजिक परंपराओं के प्रति लोगों का जुड़ाव बढ़ाना है।
नई पीढ़ी को जड़ों से जोड़ने पर जोर
ग्रामीणों और सामाजिक अगुआओं का कहना है कि ऐसे आयोजन युवाओं को अपनी भाषा, परंपरा और धार्मिक पहचान समझने का अवसर देते हैं। साथ ही समाज के विभिन्न गाँवों के बीच संवाद और आपसी सहयोग भी बढ़ता है। तैयारी बैठक में मकलू सोरेन, दिनेश सोरेन, बाबूलाल मुर्मू, बेंजामिन मुर्मू, अनिल हेम्ब्रम, ईश्वर हेम्ब्रम, अर्जुन मुर्मू और अन्य ग्रामीण उपस्थित रहे। महिलाओं ने भी बैठक में भाग लेकर आयोजन की तैयारियों में अपनी सहभागिता दर्ज कराई।












