
पश्चिम बंगाल : जंगल के पास बसे गांव में खेती केवल आजीविका नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। इसी खेती को जंगली हाथियों से बचाने की कामना ने रामकनाली गांव में एक अनोखी पूजा परंपरा को जन्म दिया। यहां देवी लक्ष्मी की प्रतिमा हाथी की पीठ पर विराजमान रूप में स्थापित की जाती है। ग्रामीणों के अनुसार, सौ वर्ष से अधिक पुरानी यह गजलक्ष्मी पूजा आज भी उसी श्रद्धा के साथ मनाई जाती है। कोजागरी लक्ष्मी पूजा के अवसर पर होने वाला यह आयोजन गांव की सामूहिक आस्था और किसानों के संघर्ष की कहानी भी समेटे हुए है। पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन पूजा से जुड़ी मान्यता और उत्साह बना हुआ है।
धान की फसल पर रहता था हाथियों का खतरा
स्थानीय निवासी दिलीप शीट के अनुसार, इलाके के अधिकांश परिवार खेती पर निर्भर हैं। विशेषकर धान पकने और कटाई के समय जंगल से निकलने वाले हाथियों के झुंड खेतों में पहुंच जाते थे। इससे किसानों की मेहनत और तैयार फसल को नुकसान होता था। ग्रामीणों ने फसलों की सुरक्षा की प्रार्थना के साथ देवी लक्ष्मी की विशेष रूप में आराधना शुरू की। हाथी को देवी का वाहन चुनने के पीछे भी खेती को हाथियों के उत्पात से बचाने की यही लोकमान्यता जुड़ी है।
हाथी पर विराजमान प्रतिमा है खास पहचान
इस पूजा में देवी लक्ष्मी का स्वरूप लोगों का ध्यान खींचता है। प्रतिमा में मां लक्ष्मी गजराज की पीठ पर विराजती हैं। पूजा की पहचान केवल देवी के इस स्वरूप से नहीं, बल्कि उसके पीछे की स्थानीय कहानी से भी बनती है। ग्रामीणों का विश्वास रहा है कि इस रूप में देवी की आराधना करने से खेतों की रक्षा होगी। यह उनकी धार्मिक मान्यता है, जिसे गांव के परिवार पीढ़ियों से आगे बढ़ाते आ रहे हैं।
नई पीढ़ी भी निभा रही पुरानी परंपरा
स्थानीय निवासी शिउली शीट के मुताबिक, इस पूजा की शुरुआत का मुख्य उद्देश्य जंगली हाथियों से फसलों की रक्षा की कामना करना था। समय के साथ यह आयोजन पूरे गांव का साझा उत्सव बन गया। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी इसके आने की प्रतीक्षा करते हैं। पूजा में पुरानी पीढ़ी का अनुभव और नई पीढ़ी का उत्साह साथ दिखाई देता है। ग्रामीणों के लिए यह अवसर अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का भी माध्यम है।
गजलक्ष्मी पूजा के आसपास रहता है उत्सव का केंद्र
ग्रामीणों के अनुसार, रामकनाली में दुर्गा पूजा का आयोजन नहीं होता। यहां त्योहार की प्रमुख रौनक कोजागरी गजलक्ष्मी पूजा के आसपास रहती है। इस अवसर पर गांव के लोग सामूहिक रूप से उत्सव में शामिल होते हैं। पूजा संपन्न होने के बाद विसर्जन के दिन महिलाएं सिंदूर खेला की रस्म निभाती हैं। इस तरह फसलों की रक्षा की कामना से शुरू हुई परंपरा आज आस्था, खेती और सामुदायिक एकजुटता की पहचान बनी हुई है।












